भारत में जातिप्रथा
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मुखिया और पंचायत हो, उसकी समय - समय पर बैठकें होती हों, कुछ उत्सवों
पर मेले हों, एक सा व्यवसाय हो, जिसका विशिष्ट संबंध रोटी - बेटी व्यवहार
से और समारोह अपमिश्रण से हो, और इसके सदस्य उसके अधिकार क्षेत्र से
विनियमित होते हों, जिसका प्रभाव लचीला हो, पर जो संबद्ध समुदाय पर प्रतिबंध
और दंड लागू करने में सक्षम हो और सबसे बढ़कर समूह से अपरिवर्तनीय।
- नेसफील्ड जाति की परिभाषा इस प्रकार करते हैं : समुदाय का एक वर्ग जो
दूसरे वर्ग से संबंधों का बहिष्कार करता हो और अपने संप्रदाय को छोड़कर
दूसरे के साथ शादी व्यवहार तथा खान - पान से परहेज करता हो।
- सर एच. रिजले के अनुसार : जाति का अर्थ है, परिवारों का या परिवार समूहों
का संगठन, जिसका साझा नाम हो, जो किसी खास पेशे से संबद्ध हो, जो
एक से पौराणिक पूर्वजों - पितरों के वंशज होने का दावा करता हो, एक जैसा
व्यवसाय अपनाने पर बल देता हो और सजातीय समुदाय का हामी हो।
- डॉ. केतकर ने जाति की परिभाषा इस प्रकार की है : दो लक्षणों वाला एक
सामाजिक समूह, (क) उसकी सदस्यता उन लोगों तक सीमित होती है, जो
जन्म से सदस्य होते हैं और जिनमें इस प्रकार जन्म लेने वाले लोग शामिल
होते हैं; (ख) कठोर सामाजिक कानून द्वारा सदस्य अपनी जाति से बाहर
विवाह करने के लिए वर्जित किए जाते हैं।
हमारे लिए इन परिभाषाओं की समीक्षा अत्यावश्यक है। यह स्पष्ट है कि अलग - अलग देखने पर तीन विद्वानों की परिभाषाओं में बहुत कुछ बाते हैं या बहुत कम तत्व हैं। अकेले देखने में कोई भी परिभाषा पूर्ण नहीं और मूल भाव किसी में भी नहीं है। उन सबने एक भूल की है कि उन्होने जाति को एक स्वतंत्र तत्व माना है, उसे समग्र तंत्र के एक अंग के रूप में नहीं लिया है। फिर भी सारी परिभाषाएं एक - दूसरे की पूरक हैं, जो तथ्य एक विद्वान ने छोड़ दिया है, उसे दूसरे ने दर्शाया है। मैं केवल उन सूत्रों पर विचार रखूंगा और उनका मूल्यांकन करूंगा, जो उपर्युक्त परिभाषाओं के अनुसार सभी जातियों में समान रूप से पाए जाते हैं, जो जाति की खासियत मानी जाती है।
हम सेनार से शुरू करते हैं। वह अपमिश्रण की बात करते हैं और यह बताते हैं कि यह जाति की प्रकृति है। इसे देखते हुए यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि यह किसी जाति से संबंधित नहीं है। यह आमतौर पर पूजा - समारोहों से संबद्ध बात है और शुद्ध ता के सामान्य सिद्धांत का पोषक तत्व है। परिणामस्वरूप इसका संबंध जाति से नहीं है और इसकी कार्यप्रणाली को ध्वस्त किए बिना, इसके प्रतिरुद्ध किया जा सकता है। अपमिश्रण का सिद्धांत जाति से जोड़ दिया गया है क्योंकि जो जाति सर्वोच्च कही जाती है, वह पुरोहित वर्ग है। हम जानते ही हैं कि पुरोहित और पवित्रता का पुराना संबंध है।