1. भारत में जातिप्रथा - Page 35

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बहुत लाभदायक साबित नहीं होता। पश्चिमी विद्वानों ने संभवतः व्यक्ति - पूजा को विशेष महत्व नहीं दिया लेकिन उन्होंने दूसरी व्याख्याओं को आधार बना लिया। उनके अनुसार भारत में जिन मान्यताओं ने जातिप्रथा को जन्म दिया, वे हैं (1) व्यवसाय, (2) विभिन्न कबायली संगठनों का प्रचालन, (3) नई धारणाओं का जन्म, (4) संकर जातियां, और (5) आव्रजन।

प्रश्न यह उठता है कि क्या वे मान्यताएं अन्य समाजों में मौजूद नहीं हैं और क्या भारत में ही उनका विशिष्ट रूप विद्यमान है। यदि वे भारत की विशेषताएं नहीं हैं और पूरे विश्व में एक समान हैं, तो उन्होंने भूमंडल के किसी अन्य भाग में जातियां क्यों नहीं गढ़ लीं? क्या इसका कारण यह है कि वे देश वेदों की इस भूमि की अपेक्षा अधिक पवित्र हैं या विद्वान गलती पर हैं? मैं सोचता हूं कि बाद की बात सही है।

अनेक लेखकों ने किसी न किसी मान्यता के आधार पर अपनी - अपनी विचाराधारा के समर्थन में उच्च सैद्धांतिक मूल्यों के दावे किए हैं। कोई विवशता प्रकट करते हुए कहता है कि गहराई से देखने पर प्रकट होता है कि ये सिद्धांत उदाहरणों के सिवाय कुछ भी नहीं हैं। मैथ्यू आर्नोल्ड का कहना है कि इसमें ‘‘महानता का कुछ सार न होते हुए भी महान नाम जुड़े हुए हैं।‘‘ सर डेनजिल इब्बतसन, नेसफील्ड, सेनार और सर एच. रिजले के सिद्धांत यहीं हैं। मोटे तौर पर इनकी आलोचना में यह कहा जा सकता है कि यह एक लीक पीटने का प्रयत्न है। नेसफील्ड उदाहरण प्रस्तुत करते हैं - ‘‘सिर्फ कार्य, केवल कार्य ही वह आधार था, जिस पर भारत की जातियों की पूर्ण प्रथा का निर्माण हुआ।‘‘ लेकिन उन्हें यह बताना होगा कि वह इस कथन से हमारी जानकारी में कोई इजाफा नहीं करते, जिसका सार यही है कि भारत में जातियों का आधार व्यवसाय मात्र है और यह स्वयं में एक लचर दलील है। हमें नेसफील्ड महोदय से इस सवाल का जवाब चाहिए कि यह कैसे हुआ कि विभिन्न व्यवसायी वर्ग विभिन्न जातियां बन गए? मैं अन्य नृजाति - विज्ञानियों के सिद्धांतों पर विचार करने के लिए सहर्ष प्रसन्न होता, यदि यह सही न होता कि नेसफील्ड का सिद्धांत एक अजीब सिद्धांत है।

मैं इन सिद्धांतों की आलोचना जारी रखते हुए इस विषय पर अपनी बात रखना चाहूंगा कि जिन सिद्धांतों ने जातिप्रथा को विभाजनकारी नियमों के पालन की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति बताया है, जैसाकि हर्बर्ट स्पेंसर ने अपने विकास के सिद्धांत में व्याख्या की है और इसे स्वाभाविक बताया है तथा इसे ‘जैविक संरचना भेद‘ कहकर लचर पुरातन पंथी शब्द जाल की धारणाओं को पुष्ट किया है या सुजनन - विज्ञान के आदि प्रयत्नों का समर्थन किया है, जिससे उसकी सनक का आभास विदित होता है कि जातिप्रथा अवश्यंभावी है या विधि - सम्मत है, यह जानकर निरीह वर्गों पर सजंग होकर इन निमयों को आरोपित किया गया है।

यह उचित ही रहेगा कि शुरू में मैं यह बात याद दिलाऊं कि अन्य समाजों के