2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 69

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

है। यदि स्वतंत्रता आदर्श है, यदि स्वतंत्रता का अर्थ इस प्रभुत्व का विनाश है जो किसी एक व्यक्ति को किसी दूसरे के ऊपर प्राप्त है, तो स्पष्ट है कि इस बात पर बल नहीं दिया जा सकता कि आर्थिक सुधार ही एक इस प्रकार का सुधार है, जिसे हासिल किया जाना चाहिए। यदि शक्ति और प्रभुत्व का स्रोत किसी विशेष समय अथवा किसी विशेष सामाजिक तथा धार्मिक समाज में मौजूद है, तो सामाजिक सुधार और धार्मिक सुधार को आवश्यक सुधार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

इस प्रकार कोई भी व्यक्ति भारत के समाजवादियों द्वारा अपनाई गई इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत पर प्रहार कर सकता है। किन्तु मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि इतिहास की आर्थिक व्याख्या इस समाजवादी दावे की वैधता के लिए आवश्यक नहीं है कि संपत्ति का समानीकरण ही एकमात्र वास्तविक सुधार है और इसे अन्य सभी बातों से वरीयता दी जानी चाहिए। फिर भी, मैं समाजवादियों से पूछना चाहता हूं कि क्या आप पहले सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाए बिना आर्थिक सुधार कर सकते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के समाजवादियों ने इस प्रश्न पर विचार नहीं किया हैं? मैं उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहता। मैं एक पत्र का उद्धरण देता हूं, जो एक प्रमुख समाजवादी ने मेरे एक मित्र को कुछ दिन पहले लिखा था। इसमें उसने कहा था, ‘‘मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता कि जब तक एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का दमन और इस प्रकार का दुर्व्यवहार रहेगा, तब तक हम भारत में एक मुक्त समाज का निर्माण कर सकेंगे। जैसा कि मैं एक समाजवादी आदर्श में विश्वास करता हूं, तो मैं अवश्य ही विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच संपूर्ण समानता के व्यवहार में विश्वास करता हूं। मैं समझता हूं कि समाजवाद इसका तथा अन्य समस्याओं का एकमात्र सही समाधान है।‘‘ अब मैं यह प्रश्न पूछता हूं कि क्या किसी समाजवादी के लिए यह कहना काफी है कि ‘‘मैं विभिन्न वर्गों के साथ व्यवहार में पूर्ण समानता में विश्वास करता हूं।‘‘ यह कहना कि ऐसा विश्वास पर्याप्त है, समाजवाद में जो कुछ निहित है, उसके संबंध में कोई जानकारी नहीं है। यदि समाजवाद एक व्यावहारिक कार्यक्रम है और केवल एक दूर का आदर्श नहीं है, तो किसी समाजवादी के लिए यह प्रश्न नहीं है कि क्या आप समानता में विश्वास करते हो? उसके लिए प्रश्न यह है कि क्या वह इस बात को नापसंद करता है कि एक वर्ग एक व्यवस्था या एक सिद्धांत के रूप में दूसरे वर्ग के साथ दुर्व्यवहार करता रहे और उसका दमन करता रहे और इस तरह अत्याचार और दमन को चलते रहते देखता रहे और इस प्रकार एक वर्ग दूसरे से अलग हो जाए। अब मैं अपनी बात को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए उन कारणों का विश्लेषण करूंगा जो समाजवाद की प्राप्ति में निहित हैं। अब यह स्पष्ट है कि समाजवादियों द्वारा अपेक्षित आर्थिक सुधार तब तक नहीं हो सकते, जब तक कि सत्ता को हथियाने के लिए क्रांति नहीं होती। सत्ता को सर्वहारा वर्ग द्वारा हथियाना जाना