74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
गया था। चातुर्वर्ण्य से बढ़कर सामाजिक संगठन की और कोई अपमानजनक पद्धति नहीं हो सकती। यह वह व्यवस्था है, जिसमें लोगों की उपयोगी क्रिया समाप्त, उप तथा अशक्त हो जाती है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इतिहास में इसका पर्याप्त प्रमाण मिलता है। भारतीय इतिहास में केवल एक काल ऐसा है, जिसे स्वतंत्रता, महानता और गौरवपूर्ण युग कहा जाता है। वह युग है, मौर्य साम्राज्य। सभी युगों में देश में पराभव और अंधकार छाया रहा है। लेकिन मौर्यकाल में चातुर्वर्ण्य को जड़ - मूल से समाप्त कर दिया गया था। मौर्य - युग में शूद्र, जिनकी संख्या काफी थी, अपने असली रूप में आए और देश के शासक बन गए। भारतीय इतिहास में पराभव और अंधकार का युग वह था, जब घृणित चातुर्वर्ण्य देश के अधिकांश भाग में अभिशाप बनकर फैल गया।
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चातुर्वर्ण्य नया नहीं है। यह उतना ही प्राचीन है, जितने कि वेद। इसीलिए आर्यसामाजियों ने हमसे अनुरोध किया है कि उनके दावों पर विचार किया जाए। यदि चातुवर्ण्य पर सामाजिक संगठन के रूप में भूतकाल से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इसकी आजमाइश की गई है और यह असफल रहा है। कितनी बार ब्राह्मणों ने क्षत्रियों का बीज मिटाया है? कितनी बार क्षतियों ने ब्राह्मणों का नाश किया है? ‘महाभारत‘ और ‘पुराण‘, ‘ब्राह्मणों‘ और क्षत्रियों के बीच हुए संघर्षों से भरे पड़े हैं। यहां तक कि वे ऐसे तुच्छ मामलों में झगड़ बैठे थे कि पहले प्रणाम कौन करेगा? जब ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों एक ही गली में मिलें, पहले रास्ता कौन देगा, ब्राह्मण या क्षत्रिय। केवल ब्राह्मण क्षत्रिय या क्षत्रिय ब्राह्मण की आंखों का कांटा नहीं था, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि क्षत्रीय अत्याचारी बन गए थे और जनता चूंकि वह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के अधीन निहत्थी थी, अतः उनके अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी। ‘भागवत‘ में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कृष्ण के अवतार लेने का केवल एक ही पवित्र उद्देश्य था और वह था क्षत्रियों का विध्वसं करना। जब विभिन्न वर्णों के बीच प्रतिद्वंद्विता और शत्रुता के इतने सारे उदाहरण मौजूद हैं, तब मैं यह नहीं समझता कि कोई व्यक्ति चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को ऐसे प्राप्य आदर्श या प्रतिमान के रूप कैसे मान सकता है, जिसके आधार पर हिन्दू समाज की पुनः रचना की जाए।
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मैंने उन लोगों के बारे में विचार किया है, जो आपके साथ नहीं हैं और जिनका आपके विचारों से खुला विरोध है। अन्य लोग भी हैं जो ऐसे हैं, जिनके साथ आप नहीं हैं, या जो आपके साथ नहीं हैं। मैं यह संकोच कर रहा था कि क्या उनके दृष्टिकोण पर विचार किया जाए। लेकिन आगे और विचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मुझे उनके दृष्टिकोण पर विचार करना होगा। इसके दो कारण हैं। पहला, जाति संबंधी समस्या के प्रति