5. जातिप्रथा का अभिशाप - Page 123

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(1) सारस्वत ब्राह्मण, (2) कान्यकुब्ज ब्राह्मण, (3) गौड़ ब्राह्मण,

(4) उत्कल ब्राह्मण, और (5) मैथिल ब्राह्मण।

पंच-गौड़ों के इन पांच में से प्रत्येक समूह के आंतरिक ढांचे को निरखने-परखने से पता चलता है कि उनकी स्थिति भी वैसी ही है, जैसी कि पंच-द्रविड़ों की बिरादरी के पांच समूहों की है। प्रश्न केवल इतना है कि पंच-द्रविड़ों में पाए जाने वाले आंतरिक विभाजनों और उप-विभाजनों से उनके ये विभाजन कम हैं या ज्यादा। इस प्रयोजन के लिए बेहतर होगा कि हर वर्ग पर अलग-अलग विचार किया जाए।

I. सारस्वत ब्राह्मण

सारस्वत ब्राह्मण तीन क्षेत्रीय वर्गों के हैंः

( I. ) पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण, ( II. ) कश्मीर के सारस्वत ब्राह्मण, और

( III. ) सिंध के सारस्वत ब्राह्मण।

पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण

पंजाब के सारस्वतों के तीन उप-विभाजन हैंः

(क) लाहौर, अमृतसर, बटाला, गुरदासपुर, जालंधर, मुल्तान, झंग और शाहपुर जिलों के सारस्वत ब्राह्मण। पुनः वे उच्च जातियों और निम्न जातियों में बंटे हुए हैं।

उच्च जातियां

(1) नवले, (2) चुनी, (3) रवाडे, (4) सरवलिए, (5) पंडित,

(6) तिखे, (7) झिंगन, (8) कुमाडिए, (9) जेतले, (10) मोहले अथवा मोले,

(11) तिखे-आंडे, (12) झिंगन-पिंगन, (13) जेतली-पेतली, (14) कुमाडिए,

लुमाडिए, (15) मोहले-बोहले, (16) बागे, (17) कपूरिए, (18) भटूरिए,

(19) मालिए, (20) कालिए, (21) सानडा, (22) पाठक, (23) कुराल,

(24) भारद्वाजी, (25) जोशी, (26) शौरी, (27) तिवाडी, (28) मरूड़,

(29) दत्ता, (30) मुझाल, (31) छिब्बर, (32) बाली, (33) मोहना,

(34) लादा, (35) वैद्य, (36) प्रभाकर, (37) शामे-पोतरे, (38) भोज-पोतरे,

(39) सिंघे-पोतरे, (40) वात्ते-पोतरे, (41) धन्नान-पोतरे, (42) द्रावडे,

(43) गेंधक, (44) तख्त-ललाडी, (45) शामा दासी, (46) सेतपाल अथवा

शेतपाल, (47) पुश्रात, (48) भारद्वाजी, (49) करपाले, (50) द्योतके,

(51) पुकरने।