3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 139

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वस्तुएं विस्थापित नहीं हो सकती थी। इसके लिए सबसे अधिक श्रेय आर्थिक प्रोत्साहन में इसके प्रभाव को दिया जा सकता है। परंतु जहां तक उसके एक प्रेरक शक्ति को प्रदान करने, या प्रोत्साहन देने का संबंध है, उसने ऐसा सम्पत्ति का धन के सामाजिक वितरण में परिवर्तन लाकर किया। इंग्लैंड के मामले में जहां पर मूल्यों में गिरावट आ रही थी, नियोक्ता को ही हानि उठानी पड़ रही थी। भारत के मामले में, चूंकि मूल्यों में वृद्धि हो रही थी इसलिए यहां पर मजदूरी प्राप्त करने वाले लोगों को हानि उठानी पड़ रही थी। दोनों ही मामलों में समाज के एक अंग के लिए अन्याय किया जा रहा था। इसलिए मुद्रा के सुधार के लिए एक सरल मामला बनाया गया। इंग्लैंड में मुद्रा सुधार की आवश्यकता को मान्यता दी गई परंतु भारत मे बहुत से लोग इसके विरुद्ध थे। कुछ लोगों की दृष्टि में रजतमान के स्थायित्व का शक्तिशाली प्रभाव पड़ा क्योंकि वे भारतीय मूल्यों में 1873 के स्तर से ऊपर वृद्धि का प्रमाण जुटाने में असफल हो गए थे। दूसरों के लिए ”ासमान विनिमय का लाभ इतना बड़ा वरदान था जिसे विनिमय को स्थिर करके आसानी से नहीं दिया जा सकता था। दोनों विचारों की असत्यता स्पष्ट है। भारत में मूल्यों में वृद्धि हुई और वह भी बहुत अधिक हुई थी। उससे कदाचित आनुतोषिक हुआ था परन्तु वह वेतनभोगी पर दंड था। इस प्रकार देखने पर भारतीय मुद्रा के सुधार के लिए आवश्यकता उसकी अपेक्षा और अधिक तात्कालिक थी जितनी अंग्रेजी मुद्रा के विषय में बताई जा सकती थी। विशुद्ध मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बढ़ते हुए मूल्यों तथा गिरते मूल्यों के बीच शायद चयन करने की काफी संभावना है। संपत्ति के वितरण पर उनके प्रभाव की दृष्टि से उस मानक के पक्ष में बहुत थोड़ा कहा जा सकता है जो उसके मूल्य में परिवर्तन करता है और जो सम्पत्ति को अपेक्षाकृत निर्धन व्यक्ति से अपेक्षाकृत धनी के हाथों में स्थानांतरित करने का साधन बनता है। स्क्रोप ने कहा है, ‘मूल्य में स्थायित्व के बिना धन एक धोखा है।’ वास्तव में, प्रभावित हितों की मात्रा को ध्यान में रखते हुए, अवमूल्यित धन को अपेक्षाकृत और भी बड़ा धोखा मानना चाहिए। उसके ऐसा होने पर भारतीय व्यापार तथा उद्योग की सम्पन्नता, एक स्वस्थ मुद्रा का प्रमाण होने के बजाए इस तथ्य के कारण बनी रही कि मुद्रा उस समय एक बीमार मुद्रा थी। विनिमय के गिरावट के फलस्वरूप, जहां तक उसके लाभ का प्रश्न हैं उससे निश्चित आय वाले भारतीय लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को हानि उठानी पड़ी। उन लोगों को सरकार तथा उसके यूरोपीय अधिकारियों के साथ रजतमान के अस्थायित्व से हानि उठानी पड़ी।

चांदी में गिरावट से इतना कुछ हुआ। परन्तु इसके कारण जो वित्तीय कठिनाइयां तथा सामाजिक अन्याय उत्पन्न हुआ, उससे उसके द्वारा उत्पन्न दुष्प्रभावों का पूर्ण विवरण नहीं मिला। गिरावट की अपेक्षा और अधिक घबराने वाली बात थी गिरावट के साथ-साथ उतार-चढ़ाव। (चार्ट V देखिए अगले पृष्ठ पर)

  1. फाइनेशियल स्टेटमेंट 1883-84 पृष्ठ 26