3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 141

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उतार-चढ़ाव ने भारत सरकार की उलझन को बहुत बढ़ा दिया जो रुपये के विनिमय मूल्य में गिरावट के कारण हुआ था माननीय श्री बेरिंग (बाद में लार्ड क्रोयर ख्1, का मत है,

‘‘यह वास्तविकता नहीं है कि तुलनात्मक दृष्टि से रुपये का मूल्य कम होता है जिसके कारण असुविधा होती है। यह संभव होगा, यद्यपि किसी भी मूल्य के रुपये के साथ भारतीय वित्तीय प्रणाली का समायोजन करना अत्यंत कष्टप्रद हो सकता था। सरकार तथा व्यापार के लिए समान रूप से असुविधा उत्पन्न करने वाली बात यह है कि रुपये का मूल्य अस्थिर होता है। भारतीय मुद्रा में, इस बात को बिल्कुल सही-सही बताना असंभव है कि भारत सरकार के वार्षिक दायित्व क्या हैं। इन दायित्वों का हिसाब प्रत्येक वर्ष नए सिरे से उन परिवर्तनों के अनुसार लगाना पड़ता है जो स्वर्ण तथा रजत के सापेक्ष मूल्य में होते हैं, और ऐसा हिसाब जो कम से कम एक साल के लिए भी लागू हो सके लगाना अत्यंत कठिन है।’’

ऐसे उतार-चढ़ाव के कारण बजट में ऐसी किसी भी दर की कल्पना नहीं की जा सकती थी जिसकी सच्ची बाजार दर में बदलने की संभावना होती। जैसा मामला था, एक वर्ष विशेष के दौरान औसत रूप में जो दर वसूल की गई, वह बजट दर से इतनी अधिक अलग थी, कि सरकार की वित्तीय स्थिति, एक वित्त मंत्री के शब्दों में ‘‘पक्की जुआबाजी’’ थी। पाउंड के भुगतान के रुपये के मूल्य में अचानक तथा व्यवस्था न होने के कारण सालाना बजट कितना अधिक अस्तव्यस्त कर दिया गया था, इसका पता लगाने में पृष्ठ 113 पर दी गई तालिका XXII से कुछ सहायता मिल सकती है।

विनिमय के अस्थायित्व के परिणामस्वरूप सरकारी वित्त में ऐसी अनिश्चितताएं थीं तो निजी व्यापार भी न्यूनाधिक एक सट्टेबाजी का मामला हो गया था। इसमें संदेह नहीं, कि विनिमय में उतार-चढ़ाव, अंतर्राष्ट्रीय बाजार की एक सामान्य घटना होती है। परन्तु यदि उनसे व्यापार तथा उद्योग में कोई विच्छेद उत्पन्न न करना हो तो ऐसे उतार-चढ़ाव की निश्चित सीमा होनी चाहिए। यदि सीमाएं निश्चित होंगी तो व्यापार का काफी निश्चित हिसाब लगाया जा सकेगा और विनिमय में अटकलबाजी एक स्थापित अंकित मूल्य से ज्ञात भिन्नता की सीमाओं के अंतर्गत सीमित होंगी। इसके विपरीत जहां पर सीमाएं ज्ञात न हो, वहां पर व्यापार का समस्त हिसाब व्यर्थ हो जाता है और विनिमय में सट्टेबाजी वैध व्यापार का स्थान ग्रहण कर लेती है। अब यह बात स्पष्ट है कि दो देशों के बीच विनिमय में उतार-चढ़ाव की हद सीमित होगी, यदि दो देशों में मूल्य का वही समान मानक हों। जहां पर मूल्य का कोई ऐसा एक समान मानक नहीं होता, यद्यपि सीमाएं विद्यमान होती हैं, परंतु वे इतनी अधिक अनिश्चित होती हैं कि उनका अधिक व्यावहारिक उपयोग नहीं हो सकता। विनिमय के निश्चित अंकित मूल्य की दरार ने चूंकि स्वर्ण तथा रजतमान वाले देशों के बीच एक समान मानक को नष्ट कर दिया था, अतः उसने ऐसे देशों के बीच विनिमय के उतार-चढ़ाव