द्वितीय संस्करण की भूमिका
‘दि प्राब्लम ऑफ रुपी’ (रुपये की समस्या) प्रथम बार सन् 1923 में प्रकाशित हुई थी। उसके प्रकाशन काल से ही, उसकी बहुत मांग रही है, इतनी अधिक कि एक या दो वर्ष के अंदर ही यह पुस्तक अप्राप्य हो गई। इस पुस्तक की मांग निरंतर बनी रही, लेकिन दुर्भाग्यवश मैं इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित न कर सका। इसका कारण यह था कि मैंने अर्थशास्त्र से हटकर अपना कार्यक्षेत्र विधि और राजनीति बना लिया था, जिससे उत्पन्न समयाभाव के कारण यह संभव नहीं था कि मैं इस कार्य को पूरा कर सकूं। इसलिए मैंने एक अन्य योजना बनाई। इस योजना के अंतर्गत ‘‘भारतीय मुद्रा और बैंकिंग’’ के नवीनतम संस्करण को दो खंडों में प्रकाशित करना था और इन दोनों खंडों में से प्रथम खंड का संबंध ‘‘रुपये की समस्या’’ से है। द्वितीय खंड 1923 से आगे ‘‘भारतीय मुद्रा और बैंकिंग का इतिहास’’ होगा।
अब पाठकों के समक्ष प्रस्तुत खंड ‘दि प्राब्लम ऑफ रुपी’ (रुपये की समस्या) का अलग नाम से मात्र पुनर्मुद्रण ही है। मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता है कि मेरे कतिपय मित्रों ने जो अर्थशास्त्र के विषय में अध्यापन कार्य करते हैं, मुझे आश्वस्त किया है कि भारतीय मुद्रा के क्षेत्र में 1923 के पश्चात् न कुछ कहा गया है और न कुछ लिखा गया है। अतः रुपये की समस्या के संबंध में जो स्थिति सन् 1923 में विद्यमान थी उसमें मुझे किसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई।
मुझे आशा है कि यह पुनर्मुद्रण पाठकों को पूर्ण रूप से नहीं, तो आंशिक रूप से आवश्य ही संतुष्ट करेगा। मैं उन्हें यह आश्वासन दे सकता हूं कि उन्हें द्वितीय
खंड के लिए अधिक समय तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। उसे यथासंभव अविलंब प्रकाशित करने के लिए मैं दृढ़प्रतिज्ञ हूं।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर
राजगृह
बंबई,
7.5.1947