अध्याय 15
अशुचि और अछूत
I
अस्पृश्यता अस्तित्व में कब आई? कट्टर या रूढि़वादी हिन्दुओं का कहना है कि यह अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। अपने कथन के आधार के समर्थन में उनका कहना है कि छुआछूत का माना जाना न केवल स्मृतियों में मिलता है जो कि जरा पीछे की हैं, किंतु धर्म सूत्रों में भी है, जो कुछ लेखकों के मत से ईसा से कुछ शताब्दियों के पूर्व के हैं।
छुआछूत की उत्पत्ति का अध्ययन करने के लिए जिस प्रश्न से आरंभ करना होगा, वह यह है कि क्या यह प्रथा इतनी पुरानी है, जितनी पुरानी यह कही जाती है?
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें धर्म सूत्रों का निरूपण करना होगा जिससे हम इस बात का निर्णय कर सकें कि जब धर्म सूत्र अस्पृश्यता और अछूतों की बात करते हैं, तो उनका तात्पर्य क्या है? क्या वे जिस वर्ग के लिए अछूत शब्द का प्रयोग करते हैं वह उन्हीं अर्थों में है जिन अर्थों में हम आज अछूत शब्द का प्रयोग करते हैं?
पहले प्रश्न को ही पहले लें। धर्म सूत्रों का निरूपण करने से निस्संदेह इस बात का पता लगता है कि उनमें से एक वर्ग का वर्णन है जिसे वे अस्पृश्य कहते हैं। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि अस्पृश्य शब्द का अर्थ है अछूत। तो भी यह प्रश्न बाकी रहता ही है कि क्या धर्म सूत्रों के अस्पृश्य वे ही हैं जो आधुनिक भारत के अस्पृश्य हैं? यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण बन जाता है, जब हमें मालूम होता है कि धर्म सूत्र ऐसे ही और भी कई शब्दों का प्रयोग करते हैं, जैसे अन्त्य, अन्त्यज, अन्त्यवासिन तथा बाह्यवाद की स्मृतियों में भी इन शब्दों का प्रयोग किया गया है। किन भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया गया है इसे जान लेना उपयोगी होगा। नीचे की तालिका से यह उद्देश्य पूरा होता हैःµ