भागः IV
पाकिस्तान और व्याधियां
हिंदू-मुस्लिम समस्या के दो पहलू हैं। इसका पहला पक्ष उन दो विभिन्न संप्रदायों की समस्या है, जो अपने अधकिरों और विशेषाधिकारों के समायोजन के इच्छुक हैं। समस्या का दूसरा पहलू उन प्रतिबिंबित प्रभावों की समस्याओं का है, जो इस पृथकता और संघर्ष के फलस्वरूप एक-दूसरे पर पड़ते हैं। उपरोक्त चर्चा के दौरान हमने पाकिस्तान की योजना पर हिंदू-मुस्ल्मि समस्या के विभिन्न पहलुओं में से पहले पर दृष्टिपात किया है। समस्या के दूसरे पहलू के परिप्रेक्ष्य में हमने पाकिस्तान की योजना की समीक्षा नहीं की है। फिर भी ऐसी समीक्षा आवश्यक है, क्योंकि हिंदू-मुस्लिम समस्या का यह पहलू भी महत्वहीन नहीं है। यदि उनके दावों के समायोजन की समस्या मात्र पर ही इस मामले को समाप्त कर दिया जाएगा, तो यह अपूर्ण अवलोकन भले ही न हो, नितांत सतही जरूर माना जाएगा। इस बात की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे एक ही ढांचे में ढले हैं, अतएव उन्हें चाहे-अनचाहे गतिविधियों के एक क्रम में सहभागी होना होगा। और यदि इस सांझी गतिविधि में एक-दूसरे का सामना वे दोनों प्रतिरोधियों की तरह करेंगे, तो उनकी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन परमावश्यक हो जाएगा, क्योंकि उनसे दोनों ही संप्रदाय प्रभावित होंगे। इससे एक ऐसी स्थिति बन जाएगी कि राज्य मृतवत् हो जाएगा ओर इस सूरत से बचाव की राह का प्रश्न आवश्यक हो जाएगा। स्थिति का अध्ययन दर्शाता है कि क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं ने एक ऐसी व्याधि का सृजन किया है, जो तीन तरह से अपनी अभिव्यक्ति कर रही है - 1. सामाजिक निष्क्रियता, 2. सांप्रदायिक संघर्ष, और 3. राजनीतिक भविष्य के प्रति राष्ट्रव्यापी निराशा।
यह व्याधि अत्यंत गंभीर है। क्या पाकिस्तान इसका निदान सिद्ध हो सकेगा? अथवा क्या उससे व्याधि और अधिक बढ़ेगी? अगले अध्यायों में इन्हीं प्रश्नों पर विचार किया गया है।