54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1937 में हुए चुनावों के बाद बने विधानमंडलों में शासक जातियों की यह स्थिति है। यह कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर शासक जातियां विधानमंडलों में अल्पसंख्या में हैं। इसके संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि शासक जातियों का वर्चस्व विधानमंडलों में संख्या के परिप्रेक्ष्य में न देखा जाए, बल्कि यह देखा जाए कि कार्यपालिका में वे कितनी प्रशासनिक शक्ति पा जाते हैं। मंत्रियों के वर्ग समूह के विषय में बहुत स्पष्ट सूचना है, जो तालिका संख्या 5 और 6 में मौजूद है। तालिकाओं पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि मंत्रिमंडल में प्रमुख शासक जाति ब्राह्मण बहुसंख्या में थे, यहां तक कि संसदीय सचिव भी ब्राह्मण थे।
अब तक जो कुछ कहा गया है, उनसे दो बातें उभर कर सामने आती हैं। पहली तो यह कि भारत में एक सुपरिभाषित शासक वर्ग है, जो निम्न शासित जातियों से विशिष्ट और भिन्न है। दूसरी बात यह है कि शासक जातियां इतनी शक्तिशाली है कि 1937 के चुनावों में कम सख्यां में चुने जाने पर भी उन्होंने आसानी से सत्ता हथिया ली और शासित जातियों पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। अब मेरे लिए केवल अपना पक्ष रखने के लिए जो बिंदू बताने के लिए बच रहा है, वह है यह बताना कि 1937 के चुनावों में कांग्रेस शासक जातियों के प्रतिनिधियों की विजय के लिए कहां तक जिम्मेदार थी। मुझे यकीन है और मैं निस्संदेह यह प्रमाणित कर दूंगा कि कांग्रेस निम्न वर्ग पर शासक जातियों का प्रभुत्व बनाने के लिए जिम्मेदार है। यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस का इससे कुछ लेना देना नहीं है। यदि कांग्रेस इसके लिए उत्तरदायी भी है तो यह मात्र संयोग था और कांग्रेस का इरादा शासक जातियों की जीत और प्रभुत्व जमाने में मदद करना ही था।
तालिका - 2
प्रान्तीय विधान सभाओं में जातियों के आधार पर कांग्रेस सदस्यों का वर्गीकरण
प्रांत ब्राह्मण गैर ब्राह्मण अनुसूचित
जातियाँ
अवर्णित योग
आसाम 6 21 1 5 33 बंगाल 15 27 6 6 54 बिहार 31 39 16 12 98 सी.पी (मध्य प्रांत) 28 35 7 - 70 मद्रास 38 90 26 5 159 उड़ीसा 11 20 5 - 36 संयुक्त प्रांत 39 54 16 24 133