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ऽडॉक्टर अम्बेडकर का मार्केस आफ लिनलिथगो को
पत्र
एमएसएस. ईयूआर. एफ. 125/24
नई दिल्ली 29 अक्तूबर, 1942
प्रिय लार्ड लिनलिथगो,
आपके साथ दूसरे साप्ताहिक साक्षात्कार के दौरान, मैंने आपको बताया था कि अनुसूचित जातियों की दशा अत्यंत असंतोषजनक है और केन्द्रीय सरकार ने वह सब कुछ नहीं किया जिसके बारे में मैंने सोचा था कि उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए सरकार को करना जरूरी है। इस बारे में आपने कृपया मुझसे कहा कि आपके विचारार्थ एक ज्ञापन तैयार किया जाए जिसमें अनुसूचित जातियों की शिकायतें और उन्हें दूर करने के उपाय प्रस्तुत किए जाएं। वे सभी बातें आपको याद होंगी। वास्तव में आपने ही मुझे बार-बार स्मरण दिलाया कि क्या ज्ञापन तैयार है। जब से मैंने कार्यभार संभाला है तब से मुझे कार्य में बहुत व्यस्त रहना पड़ता है, और इसलिए मैं ज्ञापन तैयार करने के कार्य की वरीयता न दे सका यद्यपि मैं चाहता था कि यह कार्य जल्द सम्पन्न किया जाए। फिर भी मैं प्रसन्न हूं कि आखिर आपके विचारार्थ ज्ञापन प्रस्तुत कर सका हूं।
- दुर्भाग्यवश, यह ज्ञापन @ अधिक लम्बा आलेख हो गया है। मेरे सामने यह विकल्प था कि इस ज्ञापन में केवल शिकायतों को संक्षेप में दोहराया जाए तथा उनके दूर करने के उपाय बता दिए जाएं अथवा इसे इतना विस्तृत बनाया जाए कि इसमें न केवल शिकायतें हों अपितु उनके दूर करने के उपाय सुझाए जाएं और उन्हें तर्कसम्मत बना कर अभिव्यक्त किया जाए। ऐसा करते समय मैंने इस बात पर ध्यान दिया है कि ज्ञापन में दी गई शिकायतें और उनके दूर करने के उपाय विभिन्न विभागों को उनका मत जानने के लिए भेजे जाएंगे, और जब तक ज्ञापन में तर्क न हो तब तक
ऽ द ट्रान्सफर ऑफ पॉवर, खंड 3, संख्या 125, पृ. 165.-68 @ इस खंड के भाग 2 के सेक्शन 1 में ज्ञापन को सम्मिलित किया गया है-संपादक