1. शुद्धोदन से (अंतिम) भेंट - Page 177

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

1. शुद्धोदन से (अंतिम) भेंट

  1. सारिपुत्त और मौद्गल्यापन की धर्म-दीक्षा के पश्चात् भगवान दो माह तक

राजगृह में ही ठहरे।

  1. यह सुनकर कि तथागत राजगृह में रह रहे थे, उनके पिता शुद्धोदन ने उनके

पास यह संदेश भिजवाया किः ‘‘मैं अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र को देखना

चाहता हूँ। दूसरों को उनके धर्म का लाभ प्राप्त होता रहा है, किन्तु न तो उनके

पिता और न ही उनके संबंधियों को हुआ है।’’

  1. वह व्यक्ति जिसके द्वारा संदेश भेजा गया था, वह शुद्धोदन के दरबारियों में से

एक का पुत्र कालउदायी था।

  1. और संदेशवाहक ने आगमन पर कहाः ‘‘ओ लोक-पूज्य तथागत! आपके पिता

आपके आने की राह ऐसे देख रहे हैं, जैसे कुमुदिनी सूर्य के उदय के लिये

लालायित रहती है।’’

  1. तथागत ने अपने पिता के निवेदन को स्वीकार कर लिया और अपने शिष्यों की

एक बहुत बड़ी संख्या के साथ अपने पिता के घर की यात्रा पर निकल पड़े।

  1. भगवान जगह-जगह ठहरते हुए यात्रा कर रहे थे। किन्तु कालउदायी शुद्धोदन

को सूचित करने के लिये उनसे आगे चला गया कि भगवान आ रहे हैं और

रास्ते में ही हैं।

  1. शीघ्र ही समाचार शाक्य-जनपद में फैल गया। ‘‘राजकुमार सिद्धार्थ, जो बोधि

प्राप्त करने के लिये गृह का परित्याग कर प्रव्रजित हो गये थे, ने अपने उद्देश्य

की प्राप्ति कर ली है, कपिलवस्तु में अपने घर आ रहे हैं।’’ यह बात सबके

होंठों पर थी।

  1. शुद्धोधन और महाप्रजापति अपने संबंधियों और मंत्रियों के साथ अपने पुत्र से

मिलने के लिये बाहर गये। जब उन्होंने दूर से ही अपने पुत्र को देखा तो वे

उसकी सुन्दरता, उसकी गरिमा और उसकी कांति से प्रभावित हो गये और हृदय

से प्रसन्न हुए, किन्तु वे अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं खोज

पा रहे थे।

  1. यह निस्संदेह उनका पुत्र ही था_ सिद्धार्थ के नैन-नक्श ऐसे ही थे। महाश्रमण

उनके हृदय के कितना समीप थे और फिर भी उनके मध्य कितनी अधिक दूरी

थी। वह महामुनि अब उनका पुत्र सिद्धार्थ नहीं रहा था_ अब वह, तथागत,

अहन्त, शास्ता और मानव-मात्र का गुरु था।