16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
हम किसी प्रकार नदी की पुलिया तक आए। इस पर कोई रोक नहीं थी जैसे कि पुल पर होती है। पांच-दस फुट की दूरी पर पत्थरों की पंक्ति थी। पत्थरों का रास्ता था। जिस सड़क से हम आ रहे थे नदी की पुलिया उसके समकोण पर थी। सड़क से पुलिया की ओर जाने के लिए तेजी से मुड़ना पड़ता था। पुलिया के बाजू में पहले पत्थर के पास ही थोड़ा घोड़ा सीधा जाने के बजाए मुड़ा और चौंक कर भाग गया। ताँगे का पहिया बाजू के पत्थर से इतनी जोर से टकराया कि मैं उछलकर पुलिया के पत्थर के खड़ंजे पर जा गिरा और घोड़ा तथा ताँगा पुलिया से नदी में जा गिरे। मैं इतनी जोर से गिरा कि बेहोश हो गया। महारवाड़ा नदी के ठीक दूसरे किनारे पर था जो आदमी मुझे सम्मान देने स्टेशन से पैदल आ रहे थे वे मुझसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। मुझे कंधे पर उठाया गया और पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के विलाप और चीत्कार के बीच महारवाड़ा लाया गया। इसके परिणामस्वरूप मुझे गंभीर चोटें आईं। मेरी टाँग टूट गई और मैं कई दिनों के लिए पंगु हो गया। मैं नहीं समझ सका यह सब कैसे हुआ। ताँगे पुलिया से हर रोज आते जाते हैं और ऐसा कभी नहीं हुआ कि ताँगेवाला ताँगे को पुलिया से सुरक्षित लेकर न निकला हो।
पूछताछ करने पर सही तथ्य मेरे सामने लाए गए। स्टेशन में देर होने का कारण यह था कि ताँगेवाले किसी अछूत को लाने के लिए तैयार नहीं थे। यह उनकी शान के खिलाफ था। महारों को यह सहन नहीं था कि मैं पैदल चल कर उनकी बस्ती पहुँचूं। उन्होंने सोचा कि यह मेरे लिए गरिमामय नहीं होगा। इसलिए एक समझौता हुआ। समझौता यह हुआ कि तांगे का मालिक ताँगा किराए पर देगा किंतु चलाएगा नहीं, महार ताँगा ले सकते हैं लेकिन चलाने का इंतज़ाम खुद करेंगे। महारों ने इसे सही समाधान समझा। लेकिन वे यह भूल गए कि यात्री की सुरक्षा उसके प्रति आदर दिखाने से ज्यादा जरूरी है। यदि उन्होंने ऐसा सोचा होता तो वे मुझे गंतव्य स्थान पर सुरक्षित ले जाने के लिए ताँगेवाले का प्रबंध करने की बात पर विचार करते। तथ्य यह है कि महारों में से कोई भी ताँगा चलाना नहीं जानता था क्योंकि वह उनका पेशा नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने लोगों के बीच में से ही किसी को ताँगा चलाने को कहा। उस व्यक्ति ने लगाम अपने हाथ में ली और यह सोचने लगा कि इसमें क्या कठिनाई है। लेकिन जेसे ही वह चला, उसने अपनी जिम्मेदारी महसूस की और इतना आतंकित हुआ कि उसने घोड़े को काबू में करने का प्रयास छोड़ दिया। मेरी मान-मर्यादा को बचाने के लिए चालीसगाँव के महारों ने मेरी जि़ंदगी को ही जोखिम में डाल दिया। तब मेरी समझ में आया कि एक हिन्दू ताँगेवाला, जो एक नौकर से बेहतर नहीं है, इतनी शान रखता है कि वह अपने आप को एक अछूत बैरिस्टर से भी ऊँचा समझता है।