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अध्याय 2
पुरुषों की निर्वसीयती संपत्ति में उत्तराधिकार
सामान्य सिद्धांत
97. परिभाषाः
(1) इस भाग के संबंध में आवश्यक है अन्यथा जब तक आवश्यक न हो-
(क) ’’गोत्रजय्- एक व्यक्ति दूसरे का गा़ेत्रज माना जाएगा यदि दोनों पुरुषों में
रक्त संबंध हो या दत्तक संबंध हो_
(ख फ्बंधुय्.- वह व्यक्ति दूसरे का बंधु माना जाएगा यदि दोनों पुरुषों में खून
का संबंध या दत्तक संबंध हो_
(ग) ‘‘उत्तराधिकारीय् से अभिप्राय कोई स्त्री या पुरुष जिसे इस भाग के तहत
किसी निर्वसीयती के उत्तराधिकारी के रूप में निश्चित किया गया हो_
(घ) फ्निर्वसीयतीय् वह व्यक्ति जिसने अपनी संपत्ति के संबंध में वसीयत न की
हो और ऐसी संपत्ति को निर्वसीयती छोड़ कर मर गया हो।
(2) इस भाग में प्रयुक्त पुरुष संबंधी शब्दों में यदि इस विषय या संदर्भ में विरुद्ध न
हों के इसमें महिलाओं को शामिल न किया जाए।
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98. हिंदू पुरुषों के संबंध में उत्तराधिकार के सामान्य नियमः वह संपत्ति जो कोई हिंदू पुरुष निर्वसीयती छोड़ गया है, इस भाग की धारा 105 अ से 105 जे तक, दोनों शामिल, में तय नियमों के अनुसार हस्तांतरित की जाएगीः-
(क) प्रथम, आठवीं अनुसूची के वर्ग 1 में तय संबंधी होने के नाते प्रथमिकता प्राप्त
उत्तराधिकारियों को_
(ख) द्वितीय, वर्ग 1 में शामिल संबंधियों में प्राथमिकता के अनुसार यदि कोई उत्तराधिकारी न
हो तो आठवीं अनुसूची के वर्ग 2 में दिए संबंधियों को प्राथमिकता के अनुसार_
(ग) तृतीय, यदि इन दोनों वर्गों में से कोई भी प्राथमिक उत्तराधिकारी न हो तो धारा
102 में दर्शाये गोत्रज संबंधियों को, तथा
(घ) अंतिम, यदि कोई गोत्रज न हो तो धारा 103 में कहे उसके संबंधी बंधुओं को दर्शाये।