88. परिशिष्ट-XIII - Page 405

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सयाजीराव

पत्र

नई दिल्ली,

21 मई, 1946

महामान्य,

सामान्यतः मैं महामान्य को निजी मामले में कष्ट देने का साहस नहीं कर सकता था, लेकिन मामले की परिस्थितियां असाधारण हैं। डॉ. अम्बेडकर ने दलित वर्गों के विशेष हितलाभ के लिए बंबई में कॉलेज के संस्थापन की परियोजना के लिए विŸाय सहायता के लिए संलग्न अपील मुझे सौंपी है। जैसा महामान्य को ज्ञात है दलित वर्ग अपनी निराशाजनक स्थिति में सहायता के लिए उच्च जातियों के हिंदुओं के अलावा किसी और पर निर्भर नहीं रह सकते; न ही हम शलीनता के साथ इस अपील को पूर्ण रुप में अस्वीकार कर सकते हैं क्योंकि हम उनकी वर्तमान स्थिति के लिए अपने पूर्ण उŸार दायित्व का परित्याग कर सकते हैं। यह मामला सहायता-योग्य है, चूंकि केवल शिक्षा ही नैतिक और आर्थिक रुप से दलित वर्गों के उत्थान का प्रभावी उपाय है। महामान्य डॉ. अम्बेडकर स्वयं कृतज्ञता के साथ आपके दादा की उदारता के लिए ऋणी महसूस करते हैं और इसीलिए अनुभव करते हैं कि वे अभी भी आपके राजघराने से नैतिक रुप से जुड़े हुए है। वे सोचते हैं कि वे आपको सीधे सहायता के लिए आवेदन करने में असमर्थ हैं, लेकिन चूंकि मैं महामान्य आपको सादर व्यक्तिगत रुप से जानता हूं इसलिए आपको इसकी सूचना देने की जिम्मेवारी मैंने ली है। भारत सरकार कॉलेज को अनुदान सहायता दे रही है और अनेक राजाओं ने भी दान देने का वचन दिया है, लेकिन निधियां अभी भी अत्यावष्यक रुप से जरुरी हैं ताकि परियोजना को उपयुक्त आधार पर चलाया जा सके। महामान्य यदि आप उचित चंदे के साथ उदारता से योजना की सहायता करेंगे, तो डॉ. अम्बेडकर और उनका बदकिस्मत समुदाय दोनों हमेशा के लिए आपके ऋणी हो जाएंगे।

भवदीय,

के.ए.केलुसकर रत्तू नानक चंदः लिटिल नोन फेसिस्ट्स ऑफ डॉ. अम्बडकर पृष्ठ 233 समाप्त 495-96