110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय निम्न जातियों की शिक्षा के बारे में प्रश्न
पैरा 21 - वर्षों के अनुभव के आधार पर हमने इन तथ्यों से यह व्यावहारिक निष्कर्ष निकाला है कि उच्च जातियों के निर्धन बच्चे हमसे शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए एक अति चौड़ा द्वार खोला जाना चाहिए। लेकिन पुनः यहां भी एक और दिमाग चाटने वाला प्रश्न उठता है और उसकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि गरीबों के बच्चों को बेरोकटोक सरकारी संस्थाओं में प्रवेश दिया जाता है, तो वह कौन - सी बाधा है, जो ढेड़, महार आदि जैसी सभी हेय जातियों को इन संस्थाओं की चारदीवारी के भीतर भारी संख्या में आने से रोक सकती है? हिन्दुओं के सामाजिक पूर्वाग्रह
पैरा 22 - इसमे संदेह नहीं कि यदि इन दलितों का बंबई में कोई वर्ग बनाया जाए, तो बोर्ड की सेवा में रत प्रोफेसरों तथा मास्टरों के मार्गदर्शन में उन्हें समाज में किसी से भी बेहतर बुद्धिमत्ता वाले व्यक्तियों में परिणत किया जा सकता है। तब वे जो योग्यता प्राप्त करेंगे, उसके बल पर वे देशज प्रतिभा के लिए खुले सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकेंगे और कोई बाधा उनकी इस इच्छा को दबा नहीं सकेगी। वे जज बन सकेंगे। ग्रांड जूरी और साम्राज्ञी के शांति - कमीशन के सदस्य बन सकेंगे। अनेक उदार लोगों का विचार है कि ब्रिटिश सरकार के भीतर यह तो अनुदारता और निब र्लता की पराकाष्ठा है कि वह इन पूर्वाग्रहों के आगे झुक जाए कि ऐसी नियुक्तियां तो हिन्दू समाज के भीतर कुंठा पैदा करेंगी। अतः जाति के बंधनों पर खुला प्रहार किया जाना चाहिए।
माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन के विवेकपूर्ण विचारों का उद्धरण
| p | kj |
|---|
| d | k |
|---|
पैरा 23 - लेकिन प्रस्तुत हैं भारत के प्रति उदारमना तथा विशाल हृदय प्रशासक श्री एलफिंस्टन के विवेकपूर्ण विचार, जो सही कार्य प्रणाली की ओर संकेत करते हैं। वह कहते हैं, “देखा गया है कि मिशनरी लोग निम्नतम जाति में सर्वोत्तम छात्र पाते हैं लेकिन हमें इस बारे में सतर्क रहना ही होगा, कि हम उस जाति के लोगों को कोई विशेष प्रोत्साहन किस प्रकार प्रदान करते हैं। वे न केवल अति हेय हैं, बल्कि वे समाज के बड़े - बड़े विभाजनों के अति अल्पसंख्या वाले लोगों में से हैं। आशंका है कि यदि हमारी शिक्षा प्रणाली ने सबसे पहले अपनी जड़ें उनके भीतर जमाईं तो वह कभी और विकास नहीं करेगी। हमारे सामने एक ऐसा वर्ग आ सकता है, जो उपयोगी ज्ञान में तो शेष से बेहतर होगा, पर वह उन जातियों की घृणा का पात्र हो जाएगा, जिन्हें हम नई उपलब्धियों वाले वर्ग से हीन समझने लगेंगे। ऐसी स्थिति वांछनीय होगी, जब यदि हम इसी पर संतोष कर लें कि हम अपनी शक्ति का आधार अपनी सेना या आबादी के एक हिस्से की कुर्की को बना लें, लेकिन उसका हर ऐसे प्रयास से कोई मेल नहीं
खाता, जो और अधिक व्यापक आधार पर टिकी हो।”