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यह कहा जा सकता है कि हिंदुओं की धर्मिक पुस्तकों के प्रति मैंने वह आदर प्रकट नहीं किया है, जो धर्मिक पुस्तकों के प्रति होना चाहिए। धर्मिक पुस्तकों के प्रति श्रद्धा कराई नहीं जा सकती। यह श्रद्धा तो सामाजिक स्थितियों से स्वयं उत्पन्न होती है

अथवा हटती है। धर्म ग्रंथों के प्रति ब्रह्मणों की श्रद्धा तो स्वाभाविक है, परन्तु गैर-

ब्राह्मणों के लिए यह अस्वाभाविक है। यह भेदभाव सरलता से समझा जा सकता है।

-डॉ. भीमराव अम्बेडकर