14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता
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अस्पृश्यता पर लज्जित होने के बजाए, हिंदू उसे हमेशा उचित ठहराने की कोशिश करते हैं। इसके समर्थन में उनका यह कहना है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में गुलाम-प्रथा कभी नहीं रही, और यह कि अस्पृश्यता किसी भी दशा में उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि गुलाम-प्रथा है। ऐसा ही तर्क स्व. लाला लाजपतराय जैसे महान व्यक्ति ने ‘अनहैपी इंडिया’ नामक अपनी पुस्तक में दिया है। इस कथन का खंडन करने के लिए समय का अपव्यय करने की आवश्यकता नहीं थी, अगर बाकी दुनिया को, जिसने गुलाम-प्रथा से बुरी कोई प्रथा देखी ही नहीं, यह विश्वास नहीं होता कि अस्पृश्यता गुलाम-प्रथा से बुरी हो ही नहीं सकती।
इस तर्क का उत्तर तो यही है कि यह कहना सरासर झूठ बोलना है कि हिंदुओं में गुलाम-प्रथा कभी थी ही नहीं। यह तो हिंदुओं की एक अति-प्राचीन प्रथा है। इसे हिंदुओं के विधि-निर्माता मनु ने मान्यता प्रदान की और उनके बाद उनका अनुसरण करने वाले अन्य स्मृतिकारों ने इसे व्यापक बनाया और व्यवस्थित रूप दिया। हिंदुओं में गुलाम-प्रथा केवल एक प्राचीन प्रथा के रूप में नहीं थी जो केवल धुंधले अतीत में प्रचलित रही हो, बल्कि यह तो एक ऐसी संस्था थी जो भारत के इतिहास में 1843 तक प्रचलित रही और अगर अंग्रेजी सरकार इसे उस वर्ष कानून बनाकर समापत न कर देती, तो शायद यह आज भी प्रचलित होती।
अस्पृश्यता और गुलाम-प्रथा में कौन-सी प्रथा अच्छी या बुरी है, इसे आधार मानकर उठाए जाने वाले तर्क का उत्तर देने के लिए सबसे अच्छा उपाय इन दोनों के बीच अर्थात् अस्पृश्यता का गुलाम-प्रथा के साथ, जैसी कि यह प्राचीन रोम और आधुनिक अमरीका में थी, तुलना करना और उनके अंतर को स्पष् करना है।