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परिशिष्टे ५६३

“ नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना ईसा की पांचवी शताब्दी मे हुयी ऐसा

बताया जाता है । ई. सन ६०० के समय तो यह अपनी परम किर्ती पर पहुंचा

था । नालन्दा राजगृह के पास था । राजगृह भगवान बुद्ध के समय मगध की

राजधानी थी | भगवान बुद्ध ने कई बार राजगृह की भेंट की है | उपाली राजगृह

के ही थे, और सारिपुत्र का जन्मग्राम नालक नालन्दा के पास ही था |

स्थापत्य की दृष्टि से नालन्दा सबसे बडा और सबसे सुन्दर महाविहार

था | ई. सन ६०० मे यहाँ १५०० अध्यापक और दस हजार विद्यार्थी थे | अध्ययन-अध्यापन के लिए कई शालाएँ थी | व्याख्यानों के लिऐ बडे-बडे प्रकोष्ठ बंधवाए थे । शक्रादित्य, बुद्धगुप्त, तथागतगुप्त, बालादित्य, वज्र तथा हर्ष इन छः राजाओं ने अपने अपने समय यहाँ भवन निर्माण किए थे । बंगाल के पाल वंशीय राजा और सुमात्रा के बालपुत्रदेव राजा ने भी यहाँ भवन बनवाये थे, ऐसी जानकारी मिलती है |

नालन्दा यह महायानी शाखा का प्रमुख विश्व विद्यालय था, परन्तु बौद्धो के १८ भी पन्थों के ग्रंथ यहाँ पढाये जाते थे । साथ ही अधिधर्म-कोश, हेतु-विद्या, शब्द-विद्या, चिकित्सा, संगीत, सांख्य, व्याकरण, न्याय, आदि विद्याएँ भी यहाँ सिखाई जाती थी |

नालन्दा मे हस्तलिखित ग्रन्थों का महान संग्रह था | दुनिया मे इंतना बडा ग्रंथ-संग्रह उस समय कही भी नही था | यहाँ ग्रन्थालय कें लिए नौ मंजिलोंवाली ईमारते थी | उनको ' धर्मगज ' ऐसा कहा जाता था |

इस विश्वविद्यालय मे प्रवेश पाने कें लिए इच्छुक विद्यार्थीयो को प्रवेश-परीक्षा देनी पडती थी | दिनभर का शिक्षण-क्रम घटिका-यंत्र के सहारे अनुशासन बद्ध होता था । शिक्षण-व्यवस्था के नियमों का भंग करने वाले विद्यार्थीयो को दण्ड दिया जाता था । पाठ्यक्रम के अन्त मे दीक्षान्त-समारोह होकर उत्तीर्ण विद्यार्थीयों को उपाधियाँ (डिग्रीज) प्रदान की जाती थी । ई. सन ६०२ के समय शीलभद्र नाम के विद्वान भिक्षु इस विश्वविद्यालय कें प्रधान आचार्य थें | प्रसिद्ध विद्वान नागार्जुन, शांतिरक्षक, दिडनाग, ज्ञानश्री, आदि यहाँ आचार्य रह चुके थे।

: एशिया-खंड के कोने-कोने से विद्यार्थी हजारों मील की यात्रा कर नालन्दा मे पढने के लिए आते थे । प्रसिद्ध चिनी-यात्री हुएनसांग ई. सन ६२९ मे यहाँ आया था । १० वर्ष तक उसने यहाँ पढाई की, उसने अपने यात्रा-वर्णन मे नालन्दा का विस्तृत वर्णन किया है । फाहियान ने ई. सन ४०८ मे तथा इत्सिंग