84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ऊंची है। इस श्रेणीकरण के बाह्य लक्षण के रूप में सामाजिक और धार्मिक अधिकारों का भी एक श्रेणीकरण है, जिन्हें शास्त्रीय रूप से ‘‘अष्टाधिकार‘‘ और ‘‘संस्कार‘‘ कहा जाता है। किसी जाति का दर्जा जितना ऊंचा होगा, उतने ही अधिक उसके अधिकार होंगे। जिस जाति का दर्जा जितना नीचा होगा, उतने ही कम उसके अधिकार होंगे। समुदायों के इस श्रेणीकरण तथा जातियों के इस सोपान ने जाति - व्यवस्था के विरुद्ध एक सामूहिक मोर्चा
खोलना असंभव बना दिया है। यदि कोई जाति अपने से ऊंची जाति के साथ रोटी - बेटी का संबंध करने के अधिकार दावा करती है तो उसका तत्काल निषेध कर दिया जाता है और शरारती लोग जिनमें अनेक ब्राह्मण भी शामिल हैं, यह कहते हैं कि यह रोटी - बेटी का संबंध अपने से नीची जाति तक ही अनुमत होगा। सभी लोग जाति - व्यवस्था के दास हैं। लेकिन सभी दासों का दर्जा बराबर नहीं है। आर्थिक क्रांति लाने हेतु सर्वहारा वर्ग को उत्तेजित करने के लिए कार्ल मार्क्स ने उनसे यह कहा था - ‘‘दासता को छोड़कर आपका और कुछ नहीं जाएगा।‘‘ जिस कलात्मक ढंग से विभिन्न जातियों में सामाजिक और धार्मिक अधिकार वितरित (किसी जाति को ज्यादा तो कुछ को कम) किए गए थे, कार्ल मार्क्स के नारे का वह कलात्मक ढंग जाति - व्यवस्था के विरुद्ध हिन्दुओं को उत्तेजित करने के लिए एकदम बेकार है। जातियां उच्च और अवर प्रभुसत्ताओं की श्रेणीकृत व्यवस्था होती हैं। वे अपने दर्जे के लिए सतर्क होती हैं ओर यह जानती है कि यदि जातियों का सामान्य विलय हुआ तो उनमें से कुछ की प्रतिष्ठा और शक्ति दूसरी जातियों के अपेक्षाकृत अधिक समाप्त हो जाएगी। इसे सैनिक भाषा में यों कहा जाएगा कि आप जाति - व्यवस्था पर आक्रमण करने के लिए हिन्दुओं की आम लामबंदी नहीं कर सकते।
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क्या आप तर्क का प्रश्न उठा सकते हैं और हिन्दुओं से यह कह सकते हैं कि वे जाति - व्यवस्था को समाप्त करें, क्योंकि वह तर्क के विरुद्ध है? इससे यह प्रश्न उठता है : क्या हिन्दू अपने तर्क का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं? मनु ने तीन अनुशास्तियां विहित की हैं, जिनके अनुसार प्रत्येक हिन्दू को आचरण करना चाहिए :
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः
यहां तर्क का प्रयोग करने के लिए कोई स्थान नहीं है हिन्दु को ‘स्मृति‘ या ‘सदाचार‘ का पालन करना होगा। वह किसी अन्य का पालन नहीं कर सकता। इस संबंध में सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि यदि वेंदों और स्मृतियों के अर्थों के संबंध में कोई संदेह उठता है तो उनके पाठ का निर्वचन कैसे किया जाएगा? इस महत्वपूर्ण प्रश्न के संबंध में मनु के निश्चित विचार हैं। वे कहते हैं :
योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयात् द्विजः।
स साधुभिर्बहिष्कार्यों नास्तिको वेद निन्दकः।।