2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 102

जातिप्रथा - उन्मूलन

85

इस नियम के अनुसार वेदों और स्मृतियों की व्याख्या करने वाले सिद्धांत के रूप में तर्कणावाद को पूर्णतः निराकृत किया गया है। इसे नास्तिकता के समान ही अनैतिक माना गया है और इसके लिए ‘बहिष्कार‘ करने की दंड - व्यवस्था की गई है। इस प्रकार जहां कोई विषय वेद या स्मृति से संबंधित होगा, वहां हिन्दू तर्कपूर्ण विचार नहीं कर सकता। यहां तक कि जहां वेदों और स्मृतियों में उन विषयों पर विरोध है जिनमें उन्होंने स्पष्ट निषेधाज्ञा जारी कर रखी है, वहां भी तर्क का प्रयोग नहीं किया जाएगा। यदि दो श्रुतियों में विरोध है तो उनकी प्रामाणिकता समान मानी जाएगी। दोनों में से किसी एक का पालन किया जा सकता है। लेकिन यह ज्ञात करने का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर कौन सी श्रुति प्रामाणिक है। इसे मनु ने इस प्रकार स्पष्ट किया है :

श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्याप्तत्र धर्मावुभौ स्मृतो।

‘‘यदि ‘श्रुति‘ और ‘स्मृति‘ के बीच विरोध है तो ‘श्रुति‘ को प्रामाणिक माना जाएगा।‘‘ इनके विषय में भी यह ज्ञात करने का प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर दोनों में से कौन सी प्रामाणिक है। इसका उल्लेख मनु ने निम्नलिखित श्लोक में किया है :

या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टः।

सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि तः स्मृताः।।

इसके अतिरिक्त, यदि दो स्मृतियों में विरोध है तो ‘मनु स्मृति‘ को प्रामाणिक माना जाएगा, लेकिन यह प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर कौन सी स्मृति प्रामाणिक है। वृहस्पति द्वारा दी गई व्यवस्था इस प्रकार है :

वेदायत्वोपनिबंधृत्वत् प्रमाण्यं हि मनोः स्मृतं।

मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सान शस्यते।।

अतः यह स्पष्ट है कि कोई भी हिन्दू उस किसी भी विषय में जिसमें श्रुतियों और स्मृतियों ने सुस्पष्ट निर्देश दे दिया है, अपनी तर्क शक्ति का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। ‘महाभारत‘ में भी यही नियम विहित किया गया है :

पुराणं मानवो धर्मः सांगा वेदश्चिकित्सितं।

आज्ञासिद्धानिक चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः।।

हिन्दू को इन निर्देशों का पालन करना होगा। जाति तथा वर्ण ऐसे विषय हैं, जिन पर वेदों और स्मृतियों में विचार किया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि यदि किसी हिन्दू से तर्क करने का आग्रह किया जाए तो उस पर कोई असर नहीं होता। जहां तक जाति और वर्ण का संबंध है, शास्त्रों में केवल यही नहीं कहा गया है कि हिन्दू किसी प्रश्न पर निर्णय लेने में तर्क का आधार नहीं ले सकता, बल्कि यह भी कहा गया है कि जाति और वर्ण - व्यवस्था में उसके विश्वास के आधार की समीक्षा तार्किक ढंग से नहीं की जाएगी। अनेक गैर - हिन्दू लोगों के लिए यह मौन मनोरंजन का विषय साबित होगा, जब वे यह देखेंगे कि कुछ अवसरों जैसे रेल यात्रा तथा विदेश यात्रा में अनेक हिन्दू जाति का