110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
को प्राथमिकता देते हैं। एक रूढि़वादी की तरह वे पवित्र धारणा में श्रृद्धा रखते हैं उन्हें डर है कि यदि एक बार उन्होंने सोचना शुरू किया तो कई आदर्शों और मान्यताओं का जिनसे वह चिपके हुए हैं, सत्यानाश हो जाएगा। प्रत्येक को उनसे सहानुभूमि होनी चाहिए। स्वतंत्र सोच का प्रत्येक कार्य स्पष्टतया स्थिर दुनिया के कुछ भाग को संकट में डाल देता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संतों पर निर्भर रहकर ही हम सत्य को नहीं जान सकते। आखिर, संत भी मनुष्य हैं और जैसा कि लार्ड बेलफोर ने कहा है, ‘‘सूअर की थूथनी से अधिक मनुष्य का दिमाग सत्य का पता लगाने वाला उपकरण नहीं है।‘‘ जहां तक वह सोचते हैं, मुझे वह हिन्दुओं के पुरातन ढांचे के लिए समर्थन ढूंढने हेतु बुद्धि का दुरुपयोग करते प्रतीत होते हैं। वह इसके सबसे प्रभावशाली समर्थक हैं और इसलिए हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
महात्मा से अलग ऐसे हिन्दु नेता भी हैं, जो केवल विश्वास और अनुसरण करने से ही संतुष्ट नहीं है। वे सोचने का साहस करते हैं और अपनी सोच के परिणाम के अनुसार कार्य करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश या तो वे बेईमान लोग हैं या जब लोगों को सही मार्गदर्शन देने का प्रश्न उठता है तो वे उदासीन बन जाते हैं। लगभग सभी ब्राह्मणों ने जाति के नियम का उल्लंघन किया है। जूते बेचने वाले ब्राह्मणों की संख्या उनसे अधिक है, जिन्होंने पुरोहिताई छोड़ दी है। उन्होंने न केवल ऐसे व्यवसाय अपना लिए हैं जो उनके लिए शास्त्रों द्वारा वर्जित हैं। लेकिन ऐसे कितने ब्राह्मण हैं जो रोज जाति का नियम तोड़ते हैं, जो जाति और शास्त्रों के विरुद्ध उपदेश देंगे? क्योंकि उसकी मूल प्रवृत्ति और नैतिक विवेक उनकी दृढ़ धारणा का समर्थन नहीं कर सकता लेकिन ऐसे सैंकड़ों हैं जो रोज जाति को तोड़ते हैं तथा शास्त्रों को रौदते हैं लेकिन जो जाति के सिद्धांत और शास्त्रों की पवित्रता के कट्टर समर्थक हैं। यह दोगलापन क्यों? क्योंकि वे महसूस करते हैं कि यदि जाति का जुआ लोगों ने उतार फेंका, तो ब्राह्मण वर्ण की सत्ता और सम्मान के लिए वे संकट पैदा कर देंगे। बुद्धिजीवी वर्ग की इस बेईमानी से आम लोग उनके विचारों के फल से वंचित हो जाते हैं। यह एक लज्जाजनक तथ्य है।
मैथ्यू आरनोल्ड के शब्द हैं कि ‘‘हिन्दू दो दुनिया में विचर रहे है - एक है मृत दुनिया और दूसरी शक्ति रहित जन्म लेने वाली।‘‘ उन्हें क्या करना चाहिए? महात्मा जिससे वे मार्गदर्शन की अपील करते हैं, वह सोचने में विश्वास नहीं करते, इसलिए मार्गदर्शन नहीं कर सकते जो अनुभव की कसौटी पर खरा उतरे। बुद्धिजीवी वर्ग जिनकी ओर लोग मार्गदर्शन के लिए निहारते हैं, वे या तो अधिक बेईमान हैं या उदासीन, इसलिए सही दिशा की ओर जाने की शिक्षा उन्हें नहीं मिल पाती है। इस त्रासदी की स्थिति में हम विलाप करते हुए कह सकते हैं - अरे हिन्दुओं, तुम्हारे नेतागण ऐसे हैं।