जातिप्रथा - उन्मूलन
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जाएं, तो प्रत्येक वर्तमान धर्म असफल हो जाएगा। लेकिन यह तथ्य हिन्दू और हिन्दू धर्म के हिमायती महात्मा को दिलासा या और अधिक आधार नहीं देता कि एक पागल आदमी के होने से दूसरे पागल आदमी को दिलासा हो या एक अपराधी के होने से दूसरे अपराधी को दिलासा हो। मैं महात्मा को आश्वासन देना चाहता हूं कि यह केवल हिन्दू और हिन्दू धर्म की असफलता नहीं है, जिसने मेरे मन में धृणा और अवमानना की भावना भर दी है, जिसका मुझ पर आरोप लगाया गया है। मैं मानता हूं कि यह दुयि एक अपूर्ण दुनिया है और जो भी इसमें जीना चाहता है, उसे अपूर्णता को सहन करना चाहिए। लेकिन जब कि मैं समाज की अपूर्णता तथा कमियों में जीने के लिए तैयार हूं, जिसमें मुझे कठिनाई से आगे बढ़ना मेरी नियति है तो मैं महसूस करता हूं कि उस समाज में जीने के लिए मैं सहमत नहीं हूं जो गलत आदर्शों को संजोए रखता है या एक ऐसा समाज जिसके आदर्श सही हैं, परंतु वह अपने सामाजिक जीवन को उन आदर्शों के अनुरूप ढालना नहीं चाहता है। अगर मुझे हिन्दू और हिन्दू धर्म से ऊब पैदा होती है तो यह इसलिए है, क्योंकि मुझे विश्वास है कि वे गलत सिद्धांतों और गलत सामाजिक जीवन का पोषण करते हैं। हिन्दू और हिन्दू धर्म से मेरा झगड़ा उनके सामाजिक आचरण की अपूर्णता से नहीं है। यह बहुत अधिक मौलिक है। यह झगड़ा उनके सिद्धांतों से है।
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मुझे प्रतीत होता है कि हिन्दू समाज को नैतिक पुनरुद्वार की आवश्यकता है, जिसे विलंबित करना खतरनाक होगा। प्रश्न यह है कि इस नैतिक पुनरुद्वार को कौन निर्धारित और नियंत्रित कर सकता है? स्पष्ट रूप से वे लोग जो अपना बौद्धिक पुनरुद्वार कर चुके हैं और वे जो इतने ईमानदार हैं कि बौद्धिक उद्धार से पैदा हुए दृढ़ विश्वास को दिखाने का साहस जिनके पास है। इस मानक से जांचने से पता चलता है कि माने हुए हिन्दू नेता, मेरे विचार से इस कार्य के लिए बिल्कुल अयोग्य है। यह कहना असंभव है कि वे प्रारंभिक रूप से भी बौद्धिक पुनरुद्वार कर चुके हैं। अगर उन्होंने अपना बौद्धिक पुनरुद्वार कर लिया है तो वे न तो अशिक्षित बहुसंख्या की तरह अपने आपको धोखा देंगे और न ही वे आदिम अज्ञान का फायदा ही उठाएंगे, जैसा कि आजकल देखा जाता है। टुकड़े - टुकड़े होते हिन्दू समाज के बावजूद भी ये नेतागण निर्लज्जता से पुराने सिद्धांतों की दुहाई देंगे, जिनका हर हालत में वर्तमान से संबंध समाप्त हो चुका है; जो आरंभिक दिनों में कितने भी उपयुक्त रहे हो। वे अब मार्गदर्शक की बजाए, एक चेतावनी बन चुके हैं। वे प्रारंभिक सिद्धांतों के प्रति अभी भी रहस्यपूर्ण सम्मान रखते हैं, जो उन्हें अनिच्छुक नहीं, बल्कि समाज की नींव की जांच करने का विरोधी बनाते हैं। हिन्दू लोग वास्तव में अपनी मान्यता के निर्माण में अविश्सनीय रूप से ध्यान नहीं देते। यही हाल हिन्दू नेताओं का है। बदलर बात यह है कि अब कोई उनकी संगति छुड़ाने का प्रस्ताव करता है तो वे अपनी मान्यताओं के लिए अवैध भावावेश से भर जाते हैं। महात्मा कोई अपवाद नहीं। ऐसा लगता है कि महात्मा सोचने में विश्वास नहीं करते। वह संतों का अनुसरण करने