निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों
की आवश्यकता
अंग्रेजों ने भारत पर 150 वर्षों से अधिक तक राज किया, पर उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि भाषावार राज्य बनाए जाएं, जब कि उस समय भी यह समस्या थी। बहुभाषी क्षेत्रों की सांस्कृतिक लालसा जानकर उस पर अमल करने की अपेक्षा उनकी अधिक रुचि केवल इस बात में थी कि प्रशासन स्थायी हो और पूरे देश में कानून और व्यवस्था बनी रहे। यह सही है कि उनके राज के अंतिम दिनों में उन्होंने भी यह महसूस किया कि उन्होंने जो प्रशासनिक व्यवस्था कायम की है, उसमें भाषाओं के लिहाज से भी कुछ न कुछ ताल - मेल होना आवश्यक है, कम से कम उन क्षेत्रों में तो किया जाना ही चाहिए, जहां भाषाओं की भिन्नता होने से उनमें परस्पर कशमकश दिखाई पड़ती है। इसलिए शायद भारत छोड़कर जाने से पहले उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे भाषा पर आधारित राज्य बना दिए। मान लो, यदि वे हमेंं छोड़कर न जाते और हम पर राज करते ही रहते तो वे अन्य क्षेत्रों को भी तार्किक दृष्टि से भाषावार राज्यों के रूप में पुनर्गठित करते।
अंग्रेजों ने भाषावार प्रांतों के निर्माण की बात सोची, इसके बहुत पहले ही श्री गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सन् 1920 में अपना जो संविधान बनाया, वह भाषावार प्रांतों पर आधारित था। इस प्रकार का संविधान बनाने के पीछे जो विचारधारा रही, वह उनकी स्थायी विचारधारा थी या लोगों को कांग्रेस की ओर आकृष्ट करने के लिए सोचा गया तात्कालिक प्रलोभन मात्र था, इसके बारे में अब अटकलें लगाना उचित नहीं होगा। पर हां, इस बात में तो संदेह नहीं है कि देर से ही सही पर अंग्रेजों को यह समझ में आ गया था कि भाषायी आधार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए और इसलिए उन्होंने इसे सीमित मात्रा में सही, पर कार्यरूप में परिणत तो किया ही।
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सन् 1945 तक तो कांग्रेस ने उस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया, जो 1920 में बने संविधान के अनुसार उसने स्वयं पैदा की थी। सन् 1945 में जब कांग्रेस के हाथ में शासन की बागडोर आई, तब इस जिम्मेदारी को निभाने का बोझ उस पर आ पड़ा। भाषावार प्रांतों के गठन के हाल ही के इतिहास पर नजर डालने से यह पता चलता है कि उस मामले की भाषावार प्रांतों के निर्माण का प्रस्ताव रखकर एक संसद - सदस्य ने पहल की। सरकार की ओर से बहस का उत्तर देने की जिम्मेदारी मेरी थी। वरिष्ठ सत्ताधारियों की राय जानने के लिए मैंने उनसे विचार - विमर्श किया। यह बात विचित्र लग सकती है, किन्तु मुझे साफ पता चल गया कि हाइकमान भाषावार प्रांतों के निर्माण के कतई खिलाफ