4. निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों की आवश्यकता - Page 169

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

है। इन परिस्थितियों में यही ठीक समझा गया कि बहस का उत्तर यदि प्रधानमंत्री स्वयं दें तो ठीक रहेगा। बहस का उत्तर देते हुए प्रधानमंत्री ने सदन को यह आश्वासन दिया कि जल्दी ही आंध्र राज्य का गठन किया जाएगा। प्रधानमंत्री के इस आश्वासन के फलस्वरूप प्रस्ताव वापस ले लिया गया। फिर मामला वहीं शांत हो गया।

दूसरी बार

संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के नाते मुझे दूसरी बार इस समस्या का सामना करना पड़ा। जब संविधान का प्रारूप तैयार हो चुका तो मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि प्रस्ताव पर हुई बहस के उत्तर में उन्होंने सदन को जो आश्वासन दिया था, उसको ध्यान में रखते हुए क्या मैं संविधान में ‘‘क‘‘ वर्ग के राज्यों में आंध्र को एक अलग राज्य के रूप में सम्मिलित कर दूं। उनका क्या उत्तर आया था, इसके बारे में और क्या हुआ, इसकी न तो मुझे याद है और न ही मेरे पास इस समय उसका कोई प्रमाण उपलब्ध है। किन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि तब संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने यू.पी. के एक वकील श्री धर की अध्यक्षता में भाषावार प्रांतों के गठन पर विचार करने के लिए एक समिति बना दी।

यह धर समिति किसी और बात के लिए नहीं तो कम से कम एक बात के लिए तो अवश्य ही याद की जाती रहेगी। समिति ने यह कहा था कि भाषा के आधार पर चाहे महाराष्ट्र को एक अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, किन्तु बंबई को किसी भी हालत में महाराष्ट्र में सम्मिलित नहीं किया जाए। कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में उस रिपोर्ट (प्रतिवेदन) पर विचार हुआ। जयपुर कांग्रेस ने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई, जिसमें प्रधानमंत्री, श्री वल्लभभाई पटेल और डॉ. पट्टाभि सीतारमैया थे। उन्होंने जो रिपोर्ट दी, उसका सार यह है कि आंध्र प्रांत का अविलंब गठन किया जाए, किन्तु मद्रास शहर तमिलों के पास ही रहे। ब्यौरेवार बातें तय करने के लिए एक अन्य समिति बनाई गई, उसने भी कमोबेश सर्वसम्मति से रिपोर्ट दी। श्री प्रकाशम् सहित आंध्र के अनेक सदस्यों ने इस रिपोर्ट का विरोध किया। वे लोग किसी भी हालत में मद्रास पर अपने दावे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इस तरह इस मामले पर निर्णय नहीं किया जा सका।

इसके बाद श्री पोट्टी श्रीरामुलु वाली दुर्घटना हुई। श्रीरामुलु ने आंध्र प्रांत के लिए आत्मोत्सर्ग किया। शासक दल के कामकाज पर यह शर्मनाक टिप्पणी ही मानी जाएगी कि एक ऐसे काम के लिए श्रीरामुलु को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जिसकी वैधता को कांग्रेस मान चुकी थीं अब जिस नए आंध्र प्रांत के निर्माण की बात मानी जा चुकी थी, उसे स्वर्गवासी श्रीरामुलु की आत्मा के लिए प्रधानमंत्री द्वारा किया गया पिंडदान ही मानना होगा। क्या किसी अन्य देश में सरकार के इस तरह के काम को सहन किया जा सकता था? अब इसके बारे में बहस से क्या फायदा?