4. निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों की आवश्यकता - Page 172

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और शहरों में बस गए हैं, क्योंकि वहां वे अपने आपको अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। केवल अभागे अछूत, कोली और माली ही बहुमत वाले मराठा समुदाय के अत्याचारों को सहन करने के लिए गांवों में बच रहे हैं। इस जातिगत बनावट को जो अनदेखा करेगा, वह स्वयं अपने जीवन को खतरे में डालने का जिम्मेदार होगा।

भाषावार प्रांतों में छोटे - छोटे समुदायों, अर्थात् अल्पसंख्यक जातियों का क्या भविष्य है। क्या वे विधायिका में चुने जाने की आशा रखें? क्या उन्हें राज्य - सेवा में कोई पद मिलने की आशा है? उनकी आर्थिक उन्नति के लिए क्या कोई ध्यान देने वाला है? इन परिस्थितियों में भाषायी प्रांत के गठन का अर्थ होगा - स्वराज को किसी एक बहुसंख्यक समुदाय के हाथों में सौंप देना। श्री गांधी के स्वराज की क्या दुर्दशा है। जो लोग समस्या के इस पहलू को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते, वे इसे तभी भली - भांति समझेंगे, जब हम भाषायी राज्य जैसे शब्द का प्रयोग न कर जाट राज्य, रेड्डी राज्य या मराठा राज्य कहेंगे।

तीसरा मसला

विचारणीय तीसरा मुद्दा यह है कि क्या भाषावार राज्यों के निर्माण का यह अर्थ लिया जाए कि एक भाषा बोलने वाले सभी लोगों के एक राज्य में इकट्ठा कर दिया जाएगा। क्या महाराष्ट्र राज्य में सभी मराठी - भाषियों को एकत्रित किया जाना है। क्या सभी (तेलुगु - भाषी) आंध्र क्षेत्रों को आंध्र राज्य में मिला दिया जाएगा? एकत्रीकरण का यह प्रश्न केवल नइ्र इकाइयों से ही संबंधित नहीं है। इसका संबंध यू.पी., बिहार और पश्चिमी बंगाल जैसे भाषा पर आधारित वर्तमान प्रांतों से भी है। जैसा कि यू.पी. के प्रसंग में हुआ है, सभी हिन्दी - भाषी लोगों को एक राज्य में समेकित करना क्यां आवश्यक है? जो ऐसे समेकन या एकत्रीकरण की मांग करते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अन्य राज्यों के साथ युद्ध करने जा रहे हैं। यदि समेकन से पृथकता का भाव पुष्ट होता हो तो आगे चलकर हमारा भारत ठीक उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जैसी स्थिति इस देश की मौर्य साम्राज्य के पतन या बिखराव के बाद हुई थी। क्या भाग्य हमें उसी ओर धकेल रहा है।

इसका यह अर्थ नहीं कि भाषावार प्रांतों के गठन का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता। इसका तो अर्थ केवल इतना है कि भाषावार प्रांत का मुखौटा पहन कर कोई बहुसंख्यक समुदाय शक्ति का दुरुपयोग न करने पाए, अर्थात् भाषावार प्रांतों के निर्माण के साथ ही उन पर निरीक्षण और नियंत्रण के उपाय भी सोचने होंगे।