4. निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों की आवश्यकता - Page 171

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बनाया जाता। किन्तु यदि प्रधानमंत्री को इस प्रस्ताव पर अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा से कोई आपत्ति है। तो क्या वे हैदराबाद रियासत के आंध्र वाले (तेलगु - भाषी) हिस्से में एक अंतःक्षेत्र (एन्क्लेव) बनाकर उसे नए आंध्र राज्य में नहीं मिला सकते? इस तरह वारंगल का मामला सुलझ सकता है। अंतः क्षेत्र बनाना भारत में कोई नई घटना नहीं होगी। किन्तु प्रधानमंत्री तो हैदराबाद में, और कश्मीर में भी विधि के विधान के विपरीत काम करने को कटिबद्ध हैं। मुझे विश्वास है कि उन्हें शीघ्र ही इसके परिणामों से सीख मिल जाएगी।

पहली शर्त

यह केवल संयोग है। मुख्य बात तो यह है कि भाषा पर आधारित राज्य को आर्थिक दृष्टि से आत्म - निर्भर होना चाहिए। भाषावार राज्य के गठन का यह पहला विचारणीय बिंदु है। दूसरा बिंदु यह होगा कि हम इस बात का पूर्वानुमान लगा सकें कि भाषावार प्रांत में क्या होने वाला है। दुर्भाग्यवश किसी ने भारत की जनसंख्या के स्वरूप का सर्वेक्षण करने की ओर ध्यान नहीं दिया है। जनगणना की रिपोर्टों से हमें केवल इतना पता चलता है कि हिन्दू कितने हैं, मुसलमान कितने, यहूदियों और ईसाइयों की संख्या कितनी है, या फिर हम यह जान सकते हैं कि अछूतों की संख्या अमुक - अमुक है। ये रिपोर्टें केवल हमारी इतनी जानकारी बढ़ाती हैं कि भारत में ये - ये धर्म प्रचलित हैं। धर्मों की संख्या जान लेने के अतिरिक्त इस प्रकार की सूचना का और कोई महत्व नहीं है। हम तो यह जानना चाहते हैं कि ये रिपोर्टें हमें यह बताएं कि भिन्न - भिन्न भाषा क्षेत्रों में जातियों का विभाजन कैसा है, किन्तु इनमें इस प्रकार की सूचना उपलब्ध नहीं होती। हमें अपने ज्ञान और जानकारी पर ही भरोसा करना पड़ता है। यदि यह कहूं कि किसी भाषा क्षेत्र में जातियों का विभाजन प्रायः इस तरह का होता है, अर्थात् उसमें एक या दो बहुसंख्यक घनी जातियां होती हैं और कुछ थोड़ी जातियां होती हैं, जो घनी जातियों के काबू में रहते हुए आश्रित जीवन व्यतीत करती हैं।

सामुदायिक या जातिगत बनावट

मैं कुछ उदाहरण प्रस्तुत करूं। पंजाब की बनावट देखें। पूरे इलाके में जाटों का प्रभुत्व है। अछूत वर्ग के लोग उनके अधीन और उन पर आश्रित हैं। आंध्र का उदाहरण लें : पूरे भाषा क्षेत्र में दो या तीन बड़े समुदाय छाए हुए हैं। वे या रेड्डी हैं, या कम्मा और कापू। वे सारी जमीन के मालिक हैं, सारे सरकारी पदों पर वे ही वे दिखाई देते हैं, या फिर सारा व्यवसाय उनके हाथों में है। अछूत उन्हीं के सहारे अपनी गुजर - बसर करते हैं। महाराष्ट्र की स्थिति देखें : पूरे महाराष्ट्र के हर गांव में आपको मराठे भरपूर संख्या में मिलेंगे। वहां ब्राह्मणों, गूजरों, कोलियों और अछूतों की स्थिति दयनीय है। कभी समय था, जब ब्राह्मण और बनिए, निर्भीक जीवन यापन करते थे। किन्तु अब समय बदल गया है। श्री गांधी की हत्या के बाद ब्राह्मण और बनिए मराठों से छिपे - छिपे रहते हैं और वे भागकर कस्बों