160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
की गुंजाइश नहीं हो सकती।
भाषावार राज्यों का गठन कितना ही आवश्यक हो, उसका निर्णय किसी प्रकार की जोर - जबरदस्ती से नहीं किया जा सकता। न ही वह किसी ऐसे ढंग से किया जाना चाहिए, जिससे केवल दलगत हित ही सिद्ध होता हो। इसका समाधान निर्मम तर्कणा से किया जाना चाहिए। मैंने यही किया है और मैं चाहता हूं कि ऐसा ही मेरे पाठक करें।
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23 दिसम्बर, 1995,
मिलिंद महाविद्यालय,
नागसेन वन, कालिज मार्ग,
औरंगाबाद (दक्षिण)