5. भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - Page 181

164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

प्रकट होता है, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया और उसके स्थान पर ये शब्द

स्वीकार किए गए, ‘हे प्रभु, इन संयुक्त राज्यों को आशीर्वाद दे।‘

भारत तो मानसिक तथा नैतिक दृष्टि से स्वयं को संयुक्त राज्य भारत कहलाने का पात्र भी नहीं है। भारत संघ तो संयुक्त राज्य भारत से अभी कोसों दूर है। लेकिन उत्तर के इस समेकन और दक्षिण के विभाजन से यह लक्ष्य सिद्ध नहीं हो सकता।

भाग II
भाषावाद की सीमितताएं

अध्याय 3

भाषावार राज्य का पक्ष - विपक्ष

‘एक राज्य, एक भाषा‘ लगभग हरेक राज्य का एक सार्वभौम लक्षण होता है। जर्मनी के संविधान की जांच कीजिए, फ्रांस का संविधान जांचिए, इटली के संविधान की परीक्षा कीजिए, इंग्लैंड का संविधान देखिए और संयुक्त राज्य अमरीका का संविधान देखिए। ‘एक राज्य, एक भाषा‘ यही नियम है।

जहां कहीं भी इस नियम से विचलन हुआ है, वहीं राज्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। मिश्रित भाषावार राज्यों के उदाहरण प्राचीन आस्ट्रियन साम्राज्य और प्राचीन तुर्की साम्राज्य में मौजूद हैं। वे इसलिए नष्ट हो गए, क्योंकि वे बहुभाषी राज्य थे और बहुभाषी राज्यों के सभी गुणावगुण उनमें विद्यमान थे। भारत का भी यही हश्र होगा, अगर यह मिश्रित राज्यों का समूह बना रहा।

एक भाषी राज्य की स्थिरता और बहुभाषी राज्य की अस्थिरता के कारण सर्वथा स्पष्ट हैं। किसी भी राज्य की बुनियाद भाईचारे पर रखी जाती है। यह भाईचारा या सहानुभूति क्या है? संक्षेप में कहा जाए तो वह एकत्व की सामूहिक भावना की अनुभूति होती है, जो उन लोगों को, जिनमें यह भावना है, उन्हें यह अहसास दिलाती है कि वे आपस में भाई-भाई हैं। यह भावना दुधारी भावना होती है। यह किसी के अपनों के प्रति भाईचारे का भाव भी है और दूसरों के प्रति भाईचारे के अभाव की भावना भी। यह ‘समजातीयता की चेतना‘ का भाव है जो एक ओर तो उन लोगों को, जिनमें यह भाव इतना प्रबल होता है कि वे आर्थिक संघर्षों या सामाजिक श्रेणीकरण से उत्पन्न सभी भेदभावों की अवहेलना करते हैं ‘एकता के सूत्र में बांधता है‘, और दूसरी ओर उन्हें उन लोगों से अलग करता है, जो उनके समजातीय नहीं होते। यह किसी अन्य वर्ग के न होने की इच्छा को प्रकट करता है।