भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
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इस भाईचारे की भावना का अस्तित्व ही एक स्थिर और लोकतांत्रिक राज्य का आधार है।
भाषावार राज्य इतना आवश्यक क्यों है, उसका यह एक कारण है। लेकिन कोई राज्य एक भाषी ही क्यों हो, इसके कुछ अन्य कारण भी हैं। ‘एक राज्य, एक भाषा‘ का नियम क्यों आवश्यक है, इसके दो कारण हैं।
एक कारण तो यह है कि यदि राज्य में रहने वाले लोगों में भ्रातृत्व - भावना का अभाव हो तो लोकतंत्र बिना संघर्ष के चल ही नहीं सकता। नेतृत्व के लिए दो दलों में लड़ाई - झगड़े और प्रशासन में भेदभाव का व्यवहार, ये दो तत्व किसी भी मिश्रित भाषावार (द्विभाषी) में सदा बने रहते हैं और उनका लोकतंत्र के साथ निर्वाह नहीं हो सकता।
मिश्रित भाषायी राज्य में लोकतंत्र क्यों असफल रहता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण वर्तमान बंबई राज्य है। मुझे राज्य पुनर्गठन आयोग के इस सुझाव पर आश्चर्य होता है कि वर्तमान बंबई राज्य को यथावत् रहने दिया जाए, ताकि हम यह अनुभव प्राप्त कर सकें कि मिश्रित राज्य किस प्रकार उन्नति कर सकता है। बंबई विगत 20 वर्षों से मिश्रित भाषावार राज्य चला आ रहा है, जहां महाराष्ट्रियों और गुजरातियों में घोर शत्रतुता है, केवल विचार शून्य या अन्यमनस्क व्यक्ति ही इस प्रकार का मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव पेश कर सकता है। मिश्रित भाषावार राज्य में लोकतंत्र की असफलता का एक और दृष्टांत है, भूतपूर्व मद्रास राज्य। मिश्रित राज्य के रूप में संयुक्त भारत का गठन और भारत का भारत और पाकिस्तान के रूप में अनिवार्य विभाजन मिश्रित राज्य में लोकतंत्र संभव न होने के अन्य दृष्टांत हैं।
‘एक राज्य, एक भाषा‘ के नियम का अपनाया जाना क्यों आवश्यक है, इसका दूसरा कारण यह है कि जातीय तथा सांस्कृतिक विरोध का यही एकमात्र समाधान है।
तमिल आंध्रवासियों से और आंध्रवासी तमिलों से क्यों धृणा करते हैं? हैदराबाद के आध्रवासी महाराष्ट्रियों से और महाराष्ट्रीय आंध्रवासियों से क्यों धृणा करते हैं? इसका सीधा उत्तर है। ऐसा नहीं है कि उन दोनों में कोई स्वाभाविक वैर - भाव है। घृणा का कारण यह है कि उन्हें एक - दूसरे के साथ - साथ रखा दिया गया है और वे सरकार जैसी भागीदारी के आम चक्र में भाग लेने के लिए बाध्य कर दिए गए हैं। इसके अलावा इस प्रश्न का कोई और उत्तर नहीं है।
जब तक यह जोर - जबरदस्ती आमने - सामने रहने वाली स्थिति बनी रहेगी, इन दोनों में शांति स्थापित नहीं होगी।
ऐसे लोग भी हैं, जो कनाडा, स्विटजरलैंड और दक्षिण अफ्रीका के उदाहरण देते हैं। सच तो यह है कि इन द्विभाषी राज्यों का अस्तित्व है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की प्रकृति और कनाडा, स्विटजरलैंड तथा दक्षिण अफ्रीका की प्रकृति सर्वथा भिन्न है। भारत की प्रकृति विभाजन की है तो स्विटजरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा की एकीकरण की।