6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 254

प्रस्तावना

पूना की दकन सभा ने मुझे स्वर्गीय न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे के 101वें जन्मदिन पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया। जन्मदिन 18 जनवरी 1940 को मनाया जाना था। मैं आमंत्रण को स्वीकार करने के लिए अधिक उत्सुक नहीं था। इसका कारण था। मैं जानता था कि रानाडे संबंधी किसी भाषण में सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं पर मेरे विचारों को टाला नहीं जा सकता था और वे श्रोताओं को और शायद दकन सभा के सदस्यों को भी बहुत प्रीतिकर नहीं लगेंगे। पर अंततः मैंने उसे स्वीकार कर लिया। जब मैंने यह भाषण दिया था तो उस समय इसे प्रकाशित करने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी। महापुरुषों की जयंतियों पर दिए गए भाषण साधारणतया अवसर - विशेष के लिए होते हैं। उनका अधिक स्थायी मूल्य नहीं होता। मैंने यह नहीं सोचा था कि मेरा भाषण इसका अपवाद है, परंतु मेरे कुछ उत्पाती मित्र हैं। वे इस समूचे भाषण को छपा हुआ देखने के लिए उत्सुक रहे हैं और इसे छपवाने के लिए आग्रह करते रहे हैं। मैं इस विचार के प्रति तटस्थ व उदासीन हूं। इसका जो प्रचार - प्रसार हुआ है उससे मैं पूर्णतया संतुष्ट हूं। उससे अधिक की मुझे कोई आकांक्षा व इच्छा नहीं है। साथ ही, यदि कुछ लोग ऐसे हैं जो यह सोचते हैं कि इसे गुमनामी के अंधेरे में गुम होने से बचाना आवश्यक है, तो उनको निराशा करने का कोई कारण मुझे नहीं दीख पड़ता।

प्रकाशित भाषण में और दिए गए भाषण में दो प्रकार से अंतर है। पहला तो यह कि भाषण का खंड X भाषण देते समय छोड़ दिया गया था, ताकि उसे नियत समय के अंदर पूरा किया जा सके। इस खंड के बिना भी इस भाषण को देने में डेढ़ घंटा लगा था। दूसरा अंतर यह है कि खंड VIII के एक बड़े हिस्से को छोड़ दिया गया है। इसमें रानाडे की फुले के साथ तुलना की गई थी। इसे छोड़ देने के दो कारण हैं। एक तो यह कि तुलना पर्याप्त रूप से इतनी पूर्ण तथा विस्तृत नहीं थी कि दोनो व्यक्तियों के साथ न्याय किया जा सके। दूसरा कारण यह है कि उस समय पर्याप्त कागज के मिलने में कठिनाई थी। उससे मुझे भाषण के कुछ अंश को छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा। अतः मुझे इस अंश का त्यागना ही सबसे उपयुक्त प्रतीत हुआ।

भाषण को विचित्र परिस्थितियों में प्रकाशित किया जा रहा है। साधारणतया समीक्षाएं प्रकाशन के बाद होती हैं। इस मामले में स्थिति उल्टी है। कोढ़ में खाज यह है कि समीक्षाओं में भाषण की अत्यंत कठोर शब्दों में निंदा की गई है। मुख्यतः यह प्रकाशकों