238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
का सिरदर्द है। मुझे खुशी है कि प्रकाशक जोखिम को जानता है और उसे उठा रहा है। इसके बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। केवल यह कहना है कि यह भाषण मेरे मित्रों के इस विचार की पुष्टि करता है कि इसमें ऐसी सामग्री है, जिसका क्षणिक से अधिक मूल्य है। जहां तक मेरा संबंध है, मैं समाचार - पत्रों में प्रकाशित इस भाषण की निंदा से तनिक भी दद्विग्न नहीं हूं। इसकी निंदा का आधार क्या है? और इसकी निंदा करने के लिए कौन आगे आया है?
मेरी निंदा इसलिए की जाती है कि मैंने श्री गांधी और श्री जिन्ना की उस गड़बड़ी के लिए आलोचना की, जो उन्होंने भारतीय राजनीति में फैलाई। अतः मुझ पर यह आरोप लगाया जाता है कि ऐसा करके मैंने उनके प्रति घृणा और अनादर की भावना व्यक्त की है। इस आरोप के उत्तर में मुझे यह कहना है कि मैं एक आलोचक रहा हूं और आलोचक ही मुझे रहना चाहिए। हो सकता है कि मैं गलती कर रहा हूं, परंतु मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि गलती करना बेहतर है, बजाए इसके कि दूसरों से मार्गदर्शन प्राप्त किया जाए या चुपचाप बैठा जाए तथा स्थिति को बिगड़ने दिया जाए। जो लोग मुझ पर यह आरोप लगाते हैं कि मैं उनके प्रति घृणा की भावना से प्रेरित हूं, वे दो बातों को भूल जाते है। पहली बात तो यह है कि यह कथाकथित घृणा किसी ऐसी बात से उत्पन्न नहीं हुई है, जिसे वैयक्तिक कहा जा सके। यदि मैं उनके विरुद्ध हूं तो उसका कारण यह है कि मैं समझौता चाहता हूं। मैं कोई न कोई समझौता चाहता हूं। मैं किसी एक आदर्श समझौते की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं हूं। न मैं किसी ऐसे व्यक्ति को सहन कर सकता हूं, जिसकी इच्छा तथा सहमति पर समझौते की मान - मर्यादा व प्रतिष्ठा निर्भर करे और जो मुगले आजम की तरह व्यवहार करे। दूसर बात यह है कि यदि व्यक्ति का प्रेम तथा घृणा प्रबल नहीं है तो वह यह आशा नहीं कर सकता कि वह अपने युग पर कोई प्रभाव छोड़ सकेगा और ऐसी सहायता प्रदान कर सकेगा, जो महान सिद्धांतों तथा संघर्ष की अपेक्षी ध्येयों के लिए उचित हो। मैं अन्याय, अत्याचार, आडंबर तथा अनर्थ से घृणा करता हूं और मेरी घृणा उन सब लोगों के प्रति है, जो इन्हें करते हैं। वे इनके दोषी हैं। मैं अपने आलोचकों को यह बताना चाहता हूं कि मैं अपने घृणा - भावों को वास्तविक बल व शक्ति मानता हूं। वह केवल उस प्रेम की अभिव्यक्ति हैं, जो मैं उन ध्येयों व उद्देश्यों के लिए प्रकट करता हूं, जिनके प्रति मेरा विश्वास है। उसके लिए मुझे किसी प्रकार की शर्म महसूस नहीं होती। अतः श्री गांधी तथा श्री जिन्ना की मैंने जो आलोचना की है, उसके लिए मैं कोई क्षमा - याचना या खेद प्रकट नहीं करता, क्योंकि इन दोनों महानुभावों ने भारत की राजनीतिक प्रगति को ठप्प कर दिया है।