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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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मेरी निंदा कांग्रेसी समाचार - पत्रों द्वारा की जाती हैं। मैं कांग्रेसी समाचार - पत्रों को भलीभांति जानता हूं। मैं उनकी आलोचना को कोई महत्व नहीं देता। उन्होंने कभी भी मेरे तर्कों का खंडन नहीं किया है। वे तो केवल मेरे हर कार्य की आलोचना, भर्त्सना व निंदा करना जानते है। वे तो मेरी हर बात की गलत सूचना देते हैं, उसे गलत तरीके से प्रस्तुत करता है और उसका गलत अर्थ लगाते हैं। मेरे किसी भी कार्य से कांग्रेसी पत्र प्रसन्न नहीं होते। यदि मैं कहूं कि मेरे प्रति कांग्रेसी पत्रों का यह द्वेष व बैर - भाव अछूतों के प्रति हिन्दुओं के घृणा - भाव की अभिव्यक्ति ही है, तो अनुचित नहीं होगा। उनका यह द्वेष मेरे प्रति वैयक्तिक हो गया है, यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेसी पत्रों को तब भी कष्ट होता है, जब मैं उस जिन्ना की आलोचना करता हूं, जो विगत अनेक वर्षों से कांग्रेस की आलोचना का विषय तथा लक्ष्य रहा है। कांग्रेसी पत्र इन गालियों की बौछार मुझ पर करते हैं। वे कितनी भी तीखी तथा गंदी क्यों न हों, मुझे अपने कर्तव्य का पालन करना है। मैं मूर्तिपूजक नहीं हूं। मैं तो मूर्तिभंजक हूं। मेरा आग्रह है कि मैं यदि श्री गांधी तथा श्री जिन्ना से घृणा करता हूं तो मैं उन्हें केवल पसंद नहीं करता, मैं उनसे घृणा नहीं करता। उसका कारण यह है कि मैं भारत से अधिक प्रेम करता हूं। यह एक राष्ट्रवादी की सच्ची निष्ठा है। मुझे आशा है कि मेरे देशवासी किसी न किसी दिन यह सीख लेंगे कि देश, व्यक्ति से कहीं महान होता है। श्री गांधी या जिन्ना की पूजा और भारत के सेवा में आकाश - पाताल का अंतर है और वे परस्पर विरोधी भी हो सकती हैं।

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22, पृथ्वीराज रोड, नई दिल्ली

15 मार्च, 1943