242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
में कोई बात याद नहीं है। उनके संबंध में व्यक्तिगत रूप से मैं कुछ नहीं जानता। यह केवल वह जानकारी है, जो मुझे उनके काम के विषय में पुस्तक पढ़कर तथा उनके विषय में दूसरे लोगों के कथनों से मिली है। आपको मुझसे यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि मैं व्यक्तिगत अनुभव की कोई ऐसी बात कहूं, जिसमें या तो आपकी रुचि हो या आपको उससे शिक्षा मिले। एक सुप्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में उनके विषय में मेरे क्या विचार हैं और उनका आज भारतीय राजनीति में क्या स्थान है, मैं वही आपको बताना चाहता हूं।
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जैसा कि आप भलीभांति जानते हैं कि रानाडे के कुछ मित्र हैं, जो उनको एक महापुरुष के रूप में चित्रित करने में झिझक नहीं करते और कुछ अन्य लोग ऐसे हैं, जो उसी समान आग्रह से उनको वह स्थान प्रदान नहीं करते। फिर सच्चाई क्या है? परंतु यह प्रश्न मेरे विचार से एक और प्रश्न पर निर्भर होना ही चाहिए। वह प्रश्न है कि क्या इतिहास महापुरुषों का जीवन - चरित्र होता है। यह प्रश्न प्रासंगिक भी है और महत्वपूर्ण भी। क्योंकि यदि महापुरुष इतिहास के निर्माता नहीं तो कोई कारण नहीं कि हम सिनेमा के सितारों से अधिक ध्यान उनकी ओर दें। इस संबंध में अलग - अलग विचार हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो इस बात पर जोर देते हैं कि एक व्यक्ति कितना भी महान हो, समय ही उसका सृजनहार है, समय ही उसको बनाता है। समय ही सब कुछ करता है। वह कुछ नहीं करता। जिन लोगों का यह विचार व मत है, मेरे विचार से वे इतिहास की गलत व्याख्या करते हैं। ऐतिहासिक परिवर्तनों के कारणों के संबंध में तीन अलग - अलग मत रहे हैं। हमारे पास इतिहास के ऑगेस्टिनियन सिद्धांत हैं। उसके अनुसार इतिहास केवल एक दैवी योजना की अभिव्यंजना है। उसके अंतर्गत मानव - जाति को युद्ध तथा पीड़ा झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना है, जब तक वह दैवी योजना कयामत के दिन पूरी न हो सके। वकिल का मत है कि इतिहास की रचना भूगोल तथा भौतिकी ने की है। कार्ल मार्क्स ने तीसरा मत प्रतिपादित किया है। उसके अनुसार इतिहास आर्थिक शक्तियों का प्रतिफल है। इन तीनों में से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि इतिहास महापुरुषों की जीवनी होता है। वास्तव में, वे इतिहास के निर्माण में व्यक्ति को कोई स्थान नहीं देते। केवल धर्म - विज्ञानियों को छोड़कर और कोई भी इतिहास के ऑगेस्टिनियन सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता। जहां तक बकिल तथा मार्क्स का संबंध है, यद्यपि उनके कथन में सत्यता है, परंतु उनके मत पूर्ण सत्य को निरुपित नहीं करते। उनका यह मत बिल्कुल गलत है कि इतिहास के निर्माण में व्यक्ति से इतर शक्तियां ही सब कुछ होती हैं और व्यक्ति का उसे बनाने में कोई हाथ नहीं होता है। व्यक्ति से इतर शक्तियां एक निर्धारी कारक होती हैं, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। परंतु यह बात भी स्वीकार की जानी