रानाडे, गांधी और जिन्ना 243
चाहिए कि व्यक्ति से इतर शक्तियों का प्रभाव व्यक्ति पर निर्भर करता है। चकमक हर स्थान पर विद्यमान नहीं हो सकता, परंतु जहां विद्यमान होता है, वहां अग्रि उत्पन्न करने के लिए चकमक से चकमक को रगड़ने के लिए मनुष्य की आवश्यकता होती है। बीज सर्वत्र नहीं पाए जाते। परंतु वे जहां पाए जाते हैं, वहां भी मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें बोने के लिए जमीन को कमाना पड़ता है, जमीन को भुरभुरा करना पड़ता है। उसे अनुकूल बनाने के लिए खाद - पानी देना पड़ता है और इस तरह नींव पड़ती है, कृषि की। अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां धातुएं नहीं पाई जातीं, परंतु जहां पर पाई जाती हैं वहां भी उनसे वे मशीनें तथा उपकरण बनाने के लिए मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है, जो कि सभ्यता तथा संस्कृति के आधार स्तंभ हैं।
सामाजिक शक्तियों को ही देखें। विभिन्न प्रकार की अनेक दुखद स्थितियां उत्पन्न होती हैं। ऐसी ही एक प्रकार की स्थिति वह है, जिसका वर्णन थायर ने थियोडोर रुजवेल्ट के जीवन - चरित्र में किया है। वह कहते हैं :
‘‘प्रत्येक वर्ग, दल या संस्था में एक ऐसा समय आता है, जब उसका विकास रूक जाता है, उसकी धमनियां कठोर हो जाती हैं, उसके युवा वर्ग का कोई स्वप्न ही नहीं होता, उसके वृद्धजन कोई स्वप्न ही नहीं देखते, वे अपने अतीत में ही खोए रहते हैं और हताश होकर अतीत को ही शाश्वत बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। राजनीति में भी जब घोर जड़ता की यह प्रक्रिया आ जाती है, तब हम उसे दूर करने का प्रयास नहीं करते। परिवर्तित तथा नवीन परिस्थितियों के साथ स्वयं को समायोजित करने में असमर्थ पाकर हम वापस अतीत में चले जाते हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार एक बूढ़ा आदमी पुरानी आराम कुर्सी में धंस जाता है।‘‘
दूसरी प्रकार की स्थिति अपकर्ष की स्थिति नहीं, बल्कि विनाश की स्थिति है। इसकी संभावना जब भी कोई संकट होता है, उस समय तो रहती ही है। पुराने तरीके, पुरानी आदतें तथा पुराने विचार समाज का उत्थान व उत्कर्ष करने तथा उसका मार्गदर्शन करने में असफल रहते हैं। जब तक उनमें नवीनतम नहीं आती, तब तक उनके जीवित रहने की संभावना नहीं होती। कोई भी समाज निर्विध्न नहीं चलता। उसमें अपकर्ष तथा विनाश की संभावनाओं के भूचाल आते ही रहते हैं। प्रत्येक समाज को उनका सामना करना पड़ता है। कुछ जीवित रहते हैं, कुछ नष्ट हो जाते हैं और कुछ में गतिहीनता और अपकर्ष होने लगता है। यह क्यों होता है? क्या कारण है कि कुछ जीवित रहते हैं? कार्लाइल ने इसका उत्तर दिया है। वह अपनी विशिष्ट शैली में कहते हैं :
‘‘जरूरी नहीं कि कोई युग नष्ट - भ्रष्ट हो ही, यदि वह पर्याप्त महान एवं विद्वान व्यक्ति को प्राप्त कर लें। यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञानचक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो किसी भी युग का उद्धार हो सकता है।‘‘
मुझे यह उन लोगों के लिए एक बिल्कुल निर्णायक उत्तर प्रतीत होता है, जो इतिहास