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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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पैगम्बरी भविष्यवाणी रहे हैं। जो इससे इंकार करते हैं, वे इस बात पर विचार करें : हम आज राजनीति में कहा हैं और हम जहां हैं, वहां क्यों हैं? राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुए अब 50 वर्ष हो चुके हैं। इसका नेतृत्व अनेक हाथों से गुजरा है। मैं यह नहीं कहता कि वह समझदारों से नासमझों या यथार्थवादियों से आदर्शवादियों के हाथों में गया है, परंतु यह नरमपंथियों से उग्र सुधारवादियों के हाथों में चला गया है। हमारी राजनीतिक यात्रा के 50 वर्ष के अंत में आज देश कहां पर खड़ा है? इस गतिरोध का क्या कारण है? उत्तर सीधा सा है, गतिरोध का कारण है सामुदायिक समझौते का अभाव। पूछिए कि राजनीतिक समझौते के लिए सामुदायिक समझौता क्यों आवश्यक है और रानाडे के दृष्टिकोण के बुनियादी महत्व को महसूस कीजिए, इस प्रश्न का उत्तर गलत सामाजिक व्यवस्था में मिलेगा। वह लोकतंत्र का घोर विरोध करती है, वह वर्गों की प्रबल समर्थक है, वह घोर जन - विरोधी है, वह वर्ग उच्चता तथा सांप्रदायिकता से भरपूर है। यदि राजनीतिक लोकतंत्र को उसका आधार बनाया जाएगा तो वह पूर्ण विडंबना हो जाएगी। यही कारण है कि उच्च जातियों के हिन्दुओं के अलावा कोई भी बिना गंभीर समायोजन के इसे राजनीतिक लोकतंत्र का मुद्दा बनाने के लिए सहमत नहीं होगा। कुछ लोग यह तर्क देकर संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं कि गतिरोध ब्रिटिश सरकार ने उत्पन्न किया है। लोग ऐसे विचारों को ग्रहण करना पसंद करते हैं, जो उनको संतोष प्रदान करते हैं और दूसरों पर जिम्मेदारी डाल देते हैं। यह पलायनवाद की मनोवृत्ति है, परंतु इससे इस तथ्य को नहीं बदला जा सकता कि यह सामाजिक व्यवस्था का दोष है। इसी ने सांप्रदायिक समस्या को जन्म दिया है और इसी ने भारत के सामने राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न की है।

रानाडे का उद्देश्य अगर नई व्यवस्था बनाना नहीं था तो प्राचान व्यवस्था का परिमार्जन करना अवश्य था। उन्होंने हिन्दू समाज के नैतिक स्तर में सुधार लाने पर जोर दिया। यदि उनकी बातों को सुना जाता और उसका अनुसरण किया जाता तो कम से कम इस व्यवस्था की कठोरता तो समाप्त हो जाती है। भले ही इससे सामुदायिक समझौते को टाला नहीं जा सकता था, पर उसे आसान तो बनाया जा सकता था। उनके प्रयासों से जो कि सीमित थे, पारस्परिक विश्वास का मार्ग खुल जाता। परंतु राजनीतिक लोग तो राजनीतिक सत्ता के दीवाने हो गए थे और उसने उनको पूरी तरह से इतना अंधा कर दिया था कि उन्हें इसके अलावा किसी और चीज में कोई गुण नजर नहीं आता था। रानाडे को अपनी करनी का दंड मिला। क्या राजनीतिक सुरक्षा की स्वीकृति, सामाजिक सुधार की आवश्यकता को नकारने के लिए दंड नहीं है?

रानाडे को उस क्षेत्र में कितनी सफलता मिली, जिसमें उन्होंने इतनी प्रमुख भूमिका अदा की थी? कुछ अर्थों में यह प्रश्न बहुत महत्व का नहीं हैं? उपलब्धि कभी भी महानता का सच्चा मापदंड नहीं होती। जैसा कार्लाइल ने कहा, ‘‘हाय! हम यह भलीभांति जानते हैं कि आदर्शों को कभी भी व्यवहार में पूर्णतया मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता और यह ठीक ही होगा कि हम उसके किसी सहनीय सामीप्य को साभार स्वीकार कर लें।‘‘ आदर्शों