6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 273

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के लिए घोर असुविधाएं थीं। रानाडे ने अधिकार - सृजन के लिए संघर्ष किया। रानाडे हिन्दू समाज की रूग्ण तथा मृतप्राय चेतना में जीवन का संचार करना चाहते थे। रानाडे एक ऐसे सामाजिक लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते थे, जिसके बिना किसी प्रकार की निश्चित तथा स्थायी राजनीति हो ही नहीं सकती। संघर्ष दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच था और वह इस प्रश्न पर केंद्रित था कि एक राष्ट्र के जीवित रहने के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तथा सशक्त नैतिक ताने - बाने में से कौन सा अधिक महत्वपूर्ण है। रानाडे का विचार था कि नैतिक बल राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है। यही विचार महान इतिहासकार लेकी का भी था। वह इतिहास का सावधानीपूर्वक तथा तुलनात्मक अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुंच थे :

‘‘एक राष्ट्र की शक्ति तथा समृद्धि की नींव के आधार हैं : विशुद्ध घरेलू जीवन, व्यापार में ईमानदारी, नैतिकता तथा लोकहित के उच्च स्तर, सादा जीवन, साहस, सच्चाई तथा निर्णय में तर्क और उदारता का निश्चित पुट जिसमें चरित्र और बौद्धिक प्रतिभा का समान योगदान हो। यदि आप किसी राष्ट्र के भविष्य के लिए एक बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय करते हैं तो ध्यान से यह देखिए कि गुणों का उत्कर्ष हो रहा है या अपकर्ष। ध्यान दीजिए कि सार्वजनिक जीवन में किन गुणों का सबसे अधिक महत्व होता है। क्या चरित्र का महत्व बढ़ रहा है। या घट रहा है? जो लोग राष्ट्र में सर्वोच्च पद पर आसीन हैं, क्या वे उन लोगों में से हैं, जिनका नाम निजी जीवन में पार्टी का लिहाज किए बिना सक्षम पारखी लोग सच्ची श्रद्धा के साथ लेते हैं। क्या वे सच्चे विश्वास वाले, सुसंगत छवि वाले तथा निर्विवाद सत्यनिष्ठा वाले व्यक्ति हैं? केवल इस धारा को देखकर ही आप किसी राष्ट्र की जन्मपत्री तैयार कर सकते हैं।‘‘

रानाडे न केवल बुद्धिमान थे, बल्कि तर्कनिष्ठ भी थे, उन्होंने अपने विरोधियों को चेतावनी दी कि वे राजनीति में आमूल परिवर्तनवादियों तथा समाज में अति अनुदारवादियों की भूमिका अदा न करें। उन्होंने सुस्पष्ट तथा सही शब्दों में चेतावनी दी :

‘‘आप आधे - अधूरे उदार नहीं हो सकते। आप राजनीति में उदार तथा धर्म में रूढिवादी नहीं हो सकते। दिल व दिमाग एक साथ रहने चाहिएं। आप ये दोनों काम एक साथ नहीं कर सकते कि आप अपनी बुद्धि का परिष्कार कर लें, मन को पुष्ट कर लें, अपने राजनीतिक अधिकारों तथा विशेषाधिकारों का क्षेत्र भी बढ़ा लें, और साथ ही साथ अपने दिलों के द्वार बंद करके उसे संकीर्ण भी बना लें। यह एक निरर्थक स्वप्न है कि हम लोगों से उस समय यह आशा करें कि वे अपने निजी अंधविश्वास तथा सामाजिक दोषों के बंधन में बंधे रहें जब कि वे अपने शासकों से अधिकार तथा विशेषाधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शीघ्र ही इन व्यर्थ स्वप्न दुष्टाओं को अपने स्वप्नों के ध्वस्त होने का पता चल जाएगा।‘‘

अनुभव ने दर्शा दिया है कि रानाडे के यह शब्द सत्य सिद्ध हुए हैं, यहां तक कि ये