6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 277

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

आज के वे कौन से राजनीतिज्ञ हैं, जिनके साथ रानाडे की तुलना की जा सकती है? रानाडे अपने समय के महान राजनीतिज्ञ थे। अतः उनकी तुलना आज से सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति से ही करनी चाहिए। भारत के क्षितिज पर दो महापुरुष हैं और वे इतने महान हैं कि उन्हें बिना नाम लिए पहचाना जा सकता है। वे है।, गांधी और जिन्ना। वे कैसे इतिहास की रचना करेंगे, इसे तो भावी पीढ़ी ही बताएगी। हमारे लिए तो इतना काफी है कि निर्विवाद रूप से वे अखबारों की सुर्खियों पर छाए हुए हैं। उनके हाथ में बागडोर है। एक हिन्दुओं का नेता है, तो दूसरा मुस्लिमों का। वे आज के आदर्श पुरुष और नायक हैं। मैं उनकी तुलना रानाडे से करना चाहता हूं। रानाडे की तुलना में वे कैसे हैं? इसके लिए यह जरूरी है कि उनके उन स्वभावों तथा तौर - तरीकों का कुछ वर्णन किया जाए, जिनके कारण हम उनसे परिचित हो गए हैं, उनके मूल्यांकन के बारे में मैं केवल अपने विचार प्रस्तुत कर सकता हूं। सबसे पहली बात मेरे मन में यह कौंधती है कि जहां पर उनके विराट अहंभाव का संबंध है, उन जैसे अन्य दो व्यक्तियों को खोज पाना कठिन ही है। उनके लिए व्यक्तिगत प्रभुत्व ही सब कुछ है और देश - हित तो शतरंज की गोट है। उन्होंने भारतीय राजनीति को निजी मल्ल - युद्ध का अखाड़ा बना रखा है। परिणामों की उन्हें कोई परवाह नहीं। वास्तव में तो उन्हें उनकी सुध तभी आती है, जब वे घटित हो जाते है। जब वे घटित हो जाते हैं तो या तो वे उसके कारण को भुला देते हैं, या यदि वे उसे याद भी रखते हैं तो वे उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वे आत्म - तुष्टि की ओढ़नी ओढ़ लेते हैं और वह उनके सभी पश्चात्तापों को हर लेती है। वे विलक्षण एकाकीपन के ऊंचे मंच पर खड़े हो जाते हैं। वे अपने बराबरी वालों से ओट खड़ी कर लेते हैं। वे अपने से घटिया लोगों से मेलजोल पसंद करते हैं। आलोचना से वे बड़े क्षुब्ध तथा व्यग्र हो जाते हैं, पर चाटुकारों की चाटुकारिता की चाट वे बड़े प्रेम से खाते हैं। दोनों ने एक अद्भुत रंगमंच तैयार किया है और वे चीजों को इस ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि जहां भी वे जाते हैं, वहां सदा उनकी जय - जयकार होती है। निश्चय ही दोनों सर्वोच्च होने का दावा करते हैं। यदि सर्वोच्चता ही उनका दावा होती तो यह अधिक अचरज की बात नहीं होती। सर्वोच्चता के अलावा दोनों इस बात का दावा करते हैं कि उनसे तो कभी भूल व चूक हो ही नहीं सकती। धर्मपरायण नौवें पोप के पवित्र शासनकाल में जब अचुकत्व का अहं उफन रहा था तो उन्होंने कहा था, ‘‘पोप बनने से पूर्व मैं पोपीय अचुकत्व में विश्वास रखता था, अब मैं उसे अनुभव करता हूं।‘‘ यह ठीक ही रवैया इन दो नेताओं का है, जिन्हें विधाता ने अपनी असावधानी के क्षणों में हमारे नेतृत्व के लिए नियुक्त किया है। सर्वोच्चता तथा अचूकत्व की इस भावना को समाचारपत्रों ने हवा दी है, यह तो कहना ही पड़ेगा। मेरे विचार में नार्थक्लिफ छाप की जिस पत्रकारिता को वर्णन के लिए गार्डिना ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह भारत में पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर ठीक - ठीक लागू होती है। कभी