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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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भारत में पत्रकारिता एक व्यवसाय था। अब वह व्यापार बन गया है। वह तो साबुन बनाने जैसा है, उससे अधिक कुछ भी नहीं। उसमें कोई नैतिक दायित्व नहीं है। वह स्वयं के जनता का जिम्मेदार सलाहकार नहीं मानता। भारत की पत्रकारिता इस बात को अपना सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि कर्तव्य नहीं मानती कि वह तटस्थ भाव से निष्पक्ष समाचार दे, वह सार्वजनिक नीति के उस निश्चित पक्ष को प्रस्तुत करे जिसे वह समाज के लिए हितकारी समझे, चाहे कोई कितने भी उच्च पद पर हो, उसकी परवाह न किए बिना किसी भय के उन सभी को सीधा करे और लताड़े, जिन्होंने गलत अथवा उजाड़ पथ का अनुसरण किया है। उसका तो प्रमुख कर्तव्य यह हो गया है कि नायकत्व को स्वीकार करें और उसकी पूजा करे। उसकी छत्रछाया में समाचारपत्रों का स्थान सनसनी ने, विवेक - सम्मत मत का विवेकहीन भावावेश ने, उत्तरदायी लोगों के मानस के लिए अपील ने, दायित्वहीनों की भावनाओं के लिए अपील ने ले लिया। लार्ड सेलिसबरी ने नार्थक्लिफ पत्रकारिता के बारे में कहा है कि वह तो कार्यालय - कर्मचारियों के लिए कार्यालय - कर्मचारियों का लेखन है। भारतीय पत्रकारिता तो उससे भी दो कदम आगे है। वह तो ऐसा लेखन है, जैसे ढिंढोरचियों ने अपने नायकों का ढिंढोरा पीटा हो। नायक पूजा के प्रचार - प्रसार के लिए कभी भी इतनी नासमझी से देशहित की बलि नहीं चढ़ाई गई है। नायकों के प्रति ऐसी अंधभक्ति तो कभी देखने में नहीं आई, जैसी कि आज चल रही है। मुझे प्रसन्न्ता है कि आदर योग्य कुछ अपवाद भी हैं। लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं और उनकी बातों को सदा ही अनसुना कर दिया जाता है। समाचार - पत्रों की वाहवाही का कवच धारण करके इन दोनों महानुभावों की प्रभुत्व जमाने की भावना ने तो सभी मर्यादाओं को तोड़ डाला है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने न केवल अनुयायियों को, बल्कि भारतीय राजनीति को भी भ्रष्ट किया है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने अपने आधे अनुयायियों को मूर्ख तथा शेष आधों का पाखंडी बना दिया है। अपनी सर्वोच्चता के दुर्ग को सुदृढ़ करने में उन्होंने ‘बड़े व्यापारिक घरानों‘ तथा धन - कुबेरों की सहायता ली है। हमारे देश में पहली बार पैसा संगठित शक्ति के रूप में मैदान में उतरा है। जो प्रश्न प्रेसीडेंट रूजवेल्ट ने अमरीकी जनता के सामने रखे थे, वे यहां भी उठेंगे, यदि वे पहले नहीं उठे हैं : शासन कौन करेगा, पैसा या मानव? कौन नेतृत्व करेगा, पैसा या प्रतिभा? सार्वजनिक पदों पर कौन आसीन होगा, शिक्षित, स्वतंत्र, देशभक्त अथवा पूंजीवादी गुटों के सामंती दास? सामंती दास? जो भी हो फिलहाल तो भारतीय राजनीति का हिन्दू वंश अध्यात्म की ओर उन्मुख होने के बजाए नख से शिख तक अर्थ - प्रधान और धन - लोलुप हो गया है। यहां तक कि वह भ्रष्टाचार का पर्याप्त बन गया है। अनेक सुसंस्कृत व्यक्ति इस मलकुंड से कतरा रहे हैं। राजनीति तो असह्य गंदगी और मल वाले गंदे नाले जैसी बन गई है। राजनीति में भाग लेने और गंदी नाली साफ करने में कोई भेद नहीं रह गया है।