12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
जाए तो एक तगड़ा व्यक्ति जाति की खातिर लुप्त हो जाएगा। अब उससे आसानी से निबटने के लिए दो विकल्प रह जाते हैं। मैं इन्हें आसान विकल्प इसलिए कह सकता हूं, क्योंकि वह समाज के लिए उपयोगी हैं।
वह समाज के लिए कितना ही महत्वपूर्ण हो, सजातीय विवाह इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है और इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए जो इन दोनों लक्ष्यों की पूर्ति करे। ऐसी परिस्थितियों में उसे भी विधवा की तरह आजीवन विधुर रहने के लिए बाध्य या मेरे विचार से ऐसा करने के लिए राजी किया जा सकता है। यह समाधान बिल्कुल मुश्किल नहीं है, क्योंकि कुछ बिना विवश किए भी आत्म - संयम बरत सकते हैं या वे इससे भी चार कदम आगे बढ़कर ब्रह्यचर्य व्रत का पालन कर सकते हैं। लेकिन मानव प्रकृति के देखते हुए ऐसी अपेक्षा आसानी से पूर्ण नहीं हो सकती। दूसरी स्थिति में संभव है कि ऐसा व्यक्ति समूह की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने पर उसके नैतिक सिद्ध ांतों के लिए खतरा बन सकता है।
दूसरे दृष्टिकोण से देखने पर यद्यपि ब्रह्यचर्य व्रत उन मामलों में आसान है, जहां इसे सफलता से अपनाया जाता है, लेकिन फिर भी जाति की भौतिक सुख - समृद्धि के लिए लाभदायक नहीं है। यदि वह सही अर्थों में ब्रह्यचर्य व्रत का पालन करता है और सांसारिक सुखों का त्याग कर देता है, तो वह जाति के नैतिक मूल्यों या सजातीय विवाह के लिए खतरा नहीं होगा, जैसा कि उसके सांसारिक जीवन बिताने पर होता। जहां तक भौतिक सुख - समृद्धि का प्रश्न है, ब्रह्यचारी की तरह जीवनयापन करने वाला व्यक्ति जला दिए गए व्यक्ति के समान है। प्रभावी सौहार्दपूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए जाति के सदस्यों की निर्धारित संख्या होनी चाहिए।
विधुरों पर ब्रह्यचर्य थोपना सैद्धांतिक और व्यावहारिक, दोनों दृष्टियों से विफल रहता है। यह जाति के हित में है कि वह गृहस्थ रहे। समस्या केवल यह है कि उसे जाति में से ही पत्नी सुलभ कराई जाए। शुरू में इसमें कठिनाई होती है, क्योंकि जातियों में स्त्री और पुरुष का अनुपात एक - एक का है। इस तरह किसी के दुबारा विवाह की गुंजायश नहीं होती, क्योंकि जब जातियों की परिधियां बनी होती हैं तो विवाह योग्य पुरुषों और स्त्रियों की संख्या पूरी तरह संतुलित होती है। इन परिस्थितियों में विधुर को जाति में रखने के लिए उसका पुनर्निवाह उन बालिकाओं से किया जा सकता है, जो अभी विवाह योग्य न हों। विधुरों के लिए यह यथा संभव उपाय है। इस प्रकार वह जाति में बना रहेगा। इस प्रकार उनके जाति से बाहर निकलने और उनकी संख्या में कमी को रोका जा सकेगा और सजातीय विवाह वाले समाज में नैतिकता भी बनी रहेगी।
यह स्पष्ट है कि ऐसे चार तरीके हैं, जिन्हें अपनाने से स्त्री - पुरुषों में संख्या का अनुपात बनाए रखा जा सकता है : (1) स्त्री को उसके मृत पति के साथ सती कर दिया जाए, (2) उसे आजीवन विधवा रखा जाए, जो जलाने से कुछ कम पीड़ादायक है, (3) विधुरों