1. भारत में जातिप्रथा - Page 30

भारत में जातिप्रथा

13

को ब्रह्यचर्य व्रत का पालन करने को बाध्य किया जाए, और (4) विधुर का ऐसी लड़की से विवाह कर दिया जाए, जिसकी आयु अभी विवाह योग्य न हो। हालांकि मेरे उपरोक्त विचार के अनुसार विधवा को जलाना और विधुर पर ब्रह्यचर्य व्रत थोपना सजातीय विवाह को बनाए रखने के लिए समूह के प्रयत्नों के प्रति संदेहास्पद सेवा होगी। लेकिन जब साधनों को शक्ति के रूप में स्वतंत्र किया जाता है अथवा उन्हें गतिमान कर दिया जाता है, तो वे लक्ष्य बनते हैं। तब फिर ये साधन कौन सा लक्ष्य प्राप्त करते हैं। वे सजातीय विवाह की व्यवस्था को जारी रखते हैं। जब कि विभिन्न परिभाषाओं के हमारे विश्लेषण के अनुसार सजातीय विवाह और जाति एक ही बात है। अतः इन साधनों का अस्तित्व और जाति समरूप हैं, तथा जाति में इन साधनों का समावेश है।

मेरे विचार में जाति - व्यवस्था में यह जाति की सामान्य क्रियाविधि है। अब हम अपना ध्यान इन उच्च सिद्धांतों से हटाकर हिन्दू समाज में विद्यमान जातिप्रथा और उसकी क्रियाविधि की जांच में लगाएं। मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि अतीत के रहस्यों को

खोलने वालों के मार्ग में अनेक कठिनाइयां आती हैं और निःसंदेह भारत में जाति - व्यवस्था अति प्राचीन संस्था है। इन हालात में यह और भी ज्वलंत यथार्थ है कि जहां तक हिन्दुओं का संबंध है, उनके बारे में कोई आधिकारिक या लिखित संकेत नहीं हैं तथा भारतीयों का दृष्टिकोण ऐसा बन गया है कि वह इतिहास लेखन को मूर्खता मानते हैं, क्योंकि उनके लिए जगत मिथ्या है। लेकिन ये संस्थाएं जीवित रहती हैं, यद्यपि चिरकाल तक इनका लिखित प्रमाण नहीं रहता और उनके रीति - रिवाज व नैतिक मूल्य अवशेषों की भांति अपने आपमें एक इतिहास है। हम अपने कर्तव्य में सफल होंगे, यदि हम अतिरेक पुरुष और अतिरेक स्त्री से संबंधित समस्याओं का हिन्दुओं द्वारा जो निदान किया गया है, उसकी जांच करें।

सतही तौर पर देखने वालो व्यक्ति को हिन्दू समाज की सामान्य क्रियाविधि जटिल लगे, किन्तु वह स्त्रियों से संबंधित तीन असाधारण रीतियां प्रस्तुत करती है, ये हैं :

  1. सती या विधवा को उसके मृत पति के साथ जलाना।

  2. थोपा गया आजीवन वैधव्य, जिसके अंतर्गत एक विधवा को पुनःविवाह करने

की आज्ञा नहीं है।

  1. बालिका विवाह।

संन्यास के बाद भी विधुर में विकट लिप्सा होती है, परंतु कुछ मामलों में यह शुद्ध मानसिक कारणों से ही संभव है।

जहां तक मैं समझता हूं, आज तक इन प्रथाओं के उद्भव की कोई वैज्ञानिक व्याख्या सामने नहीं आई है। अनेक दार्शनिक सिद्धांत इन प्रथाओं की प्रतिष्ठा में प्रतिपादित किए गए हैं, परंतु कहीं से इनके उद्भव और अस्तित्व का संकेत नहीं मिलता। सती सम्मानीय है (ए. के. कुमार स्वामी : सती : ए डिफेंस आफ द ईस्टर्न वीमेन इन द सोशियोलोजिकल