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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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कि यदि उदारवादियों का रानाडे के प्रति आस्था, प्यार और आदर है तो उनका परम कर्तव्य एक साथ मिलकर उनका गुणगान करनी ही नहीं है, बल्कि रानाडे के विचारों और सिद्धांतों को फैलाने के लिए अपने को संगठित करना भी है।

इस बात की कितनी आशा है कि उदारवादी इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए आगे आएंगे। इस संबंध में लक्षण शुभ नहीं हैं। पिछले चुनावों में उदारवादियों ने एक भी सीट के लिए चुनाव नहीं लड़ा। निःसंदेह यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। किन्तु यह बात स्वयं ही प्रभावहीन हो जाती है, जब कोई व्यक्ति उदार दल के प्रमुख प्रकाश - स्तंभ माननीय श्रीनिवास शास्त्री की इस घोषणा को याद करता है कि वह कांग्रेस की सफलता की कामना करते हैं। इस बात की तुलना तो केवल भीष्म के विश्वसघाती और द्रोहात्मक आचरण से हो सकती है। वह माल तो कौरवों का उड़ाते थे पर उनके शत्रुओं अर्थात् पांडवों की सफलता के न केवल गति गीत अघाते थे, बल्कि उनके लिए जान भी खपाते थे। इससे यह पता चलता है कि उदारवादियों का भी रानाडे के सिद्धांतों पर से विश्वास उठ गया था। यदि उदार दल की सेहत की यही हालत है तो यह अच्छा ही होगा कि यह दल मर - मिट जाए। इससे एक नए विन्यास के लिए रास्ता खुलेगा और हमें उदारवादियों तथा उदारतावाद की व्यर्थ की बकबक व बकझक की नीरसता से छुटकारा मिलेगा। यदि ऐसा होगा तो दिवंगत रानाडे की आत्मा को शांति ही मिलेगी।