6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 293

276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

आदमी नहीं बने। उदार दल के पास कोई तंत्र या मशीनरी नहीं है। उसने एक तंत्र व मशीनरी का निर्माण क्यों नहीं किया, इसका कारण यह है कि इस दल का जन - संपर्क में विश्वास नहीं था। जन - संपर्क के प्रति विमुखता रानाडे की प्रमुखता है। जन - संपर्क की उपेक्षा करके यह दल रानाडे द्वारा छोड़ी गई परंपरा का अनुसरण कर रहा है। उदार दल के लिए रानाडे की एक और परंपरा है, और उसका संबंध सिद्धांतों तथा नीतियों की प्रेरणा - शक्ति में झूठे विश्वास से है। मेजिनी ने एक बार कहा था, ‘‘आप व्यक्ति की हत्या कर सकते हैं, उसके महान विचार की नहीं‘‘। मुझे यह सबसे गलत विचार प्रतीत होता है। मनुष्य नश्वर होते हैं। उसी प्रकार विचार भी होते हैं। यह विचार गलत है कि विचार अपना संवर्धन स्वयं कर सकते हैं। जिस प्रकार पौधे को पानी की, उसी प्रकार विचार को प्रचार की दरकार रहती है अन्यथा दोनों मुरझाकर नष्ट हो जाएंगे।

रानाडे, मेजिनी से सहमत थे और इस बात में उनका विश्वास नहीं था कि विचार के पल्लवन के लिए किसान की भांति एड़ी - चोटी का पसीना बहाने के जरूरत है। यदि उदार दल केवल सिद्धांत तथा नीति - निर्धारण से ही संतुष्ट है तो उसके लिए रानाडे की परंपरा ही उत्तरदायी है।

उदारवादियों के क्या कर्तव्य हैं? मैं यह जानता हूं कि सभी उदारवादी यही कहेंगे कि हमारा कर्तव्य अपने गुरु का अनुसरण करना है। सच्चे श्रद्धालु शिष्यों के समूह का और क्या दृष्टिकोण हो सकता है? किन्तु इसके अलावा क्या कोई और बात अधिक भ्रांतिपूर्ण और अविवेकपूर्ण हो सकती है? इस प्रकार के दृष्टिकोण के दो अर्थ लगाए जा सकते हैं। एक यह है कि महान व्यक्ति अपने शिष्यों पर अपने सिद्धांत थोपते हैं। दूसरी बात यह है कि शिष्यों को अपने गुरु से अधिक बुद्धिमान नहीं होना चाहिए। किन्तु ये दोनों निष्कर्ष गलत हैं। ये गुरु के प्रति अन्याय करते हैं। कोई भी महापुरुष वास्तव में अपने सिद्धांतों या निष्कर्षों को अपने शिष्यों पर थोपकर उन्हें पंगु नहीं बनाता। महापुरुष अपने शिष्यों पर अपने सिद्धांत नहीं थोपता। वह उनका आह्वान करता है और उनकी विभिन्न क्षमताओं को जागृत करके उन्हें कर्मठ बनाता है। शिष्ट अपने गुरु से केवल मार्गदर्शन प्राप्त करता है। वह अपने गुरु के निष्कर्षों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। अपने गुरु के सिद्धांतों या निष्कर्षों को अस्वीकार करने में शिष्य की कोई कृतध्नता नहीं होती। जब वह उन्हें पुनः अस्वीकार करता है, तब भी वह हार्दिक आदर के साथ अपने गुरु के संबंध में यह स्वीकार करता है, ‘‘आपने मुझसे स्वयं मेरा परिचय कराया, मुझे ज्ञान प्रदान किया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।‘‘ गुरु इस आदर से कम का पात्र नहीं है। और शिष्य इससे अधिक आदर लेने के लिए बाध्य नहीं है।

अतः यह बात गुरु के लिए भी सही नहीं है और स्वयं शिष्य के लिए भी सही नहीं है कि वह गुरु के सिद्धांतों और निष्कर्षों के बंधन में बंधकर रह जाए। उसका कर्तव्य सिद्ध ांतों को जानना है और यदि वह उनके मूल्यों और उनकी सार्थकता से संतुष्ट हो जाए तो उनका प्रचार - प्रसार करना है। यह प्रत्येक गुरु की इच्छा होती है। ईसा मसीह और बुद्ध ने भी यही चाहा था। मुझे पूरा विश्वास है कि रानाडे की भी यही इच्छा रही होगी