2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 45

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तीसरे संस्करण की प्रस्तावना

इस निबंध का दूसरा संस्करण 1937 में प्रकाशित हुआ था और बहुत थोड़े ही समय में वह बिक गया। काफी समय से इसके नए संस्करण की मांग आ रही थी। मेरी मंशा थी कि मैं इस निबंध को नया रूप दूं और इसमें अपने एक अन्य निबंध ‘भारत में जातियां, उनका उद्गम और उनकी संरचना‘ को भी शामिल कर दूं। मेरा यह निबंध ‘इंडियन एंटीक्वेरी‘ जरनल के मई 1917 के अंक में प्रकाशित हुआ था। किन्तु मुझे समय नहीं मिल सका और ऐसा करने की संभावना भी बहुत कम है और चूंकि जनता भी लगातार इसकी मांग कर रही है, इसलिए प्रस्तुत संस्करण को इसके दूसरे संस्करण के मात्र पुनर्मुद्रण के रूप में ही प्रकाशित करके ही मुझे संतोष है।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यह निबंध इतना अधिक लोकप्रिय रहा। मुझे आशा है कि यह अपने अपेक्षित उद्देश्य की पूर्ति कर सकेगा।

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22, पृथ्वीराज रोड,

नई दिल्ली,

1 दिसम्बर, 1944