2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 46

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आमुख

12 दिसम्बर, 1935 को मुझे जातपांत तोड़क मंडल के मंत्री श्री संत राम का पत्र

प्राप्त हुआ, जो इस प्रकार है :

प्रिय डाक्टर साहेब,

आपके 5 दिसम्बर के कृपा पत्र के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद। आपकी आज्ञा के बिना मैंने इसे प्रेस को दे दिया है, इसके लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूं। मैं समझता हूं कि इसके प्रचारित करने में कोई हानि नहीं है। आप एक महान चिंतक हैं और मेरा यह सुविचारित मत है कि आपने जाति - समस्या का जितनी गहराई से अध्ययन किया है, उतना किसी और ने नहीं किया। मुझे स्वयं और हमारे मंडल को हमेशा ही आपके विचारों से लाभ पहुंचा है। मैंने अनेक बार ‘क्रांति‘ में इसका प्रचार और स्पष्टीकरण किया है और अनेक सम्मेलनों में इस पर भाषण भी दिए हैं। मैं आपके इस नए सूत्र, अर्थात् ‘जिन आर्थिक विश्वासों पर जातिप्रथा की नींव खड़ी है, उनके अस्तित्व की समाप्ति के बिना जातपांत को तोड़ना संभव नहीं होगा‘ की व्याख्या को पढ़ने का बहुत उत्सुक हूं। कृपया अपनी सुविधानुसार यथाशीघ्र विस्तार से इसकी व्याख्या करें, ताकि हम इस विचार पर प्रेस और मंचों से समर्थन कर सकें। फिलहाल, मैं इस संबंध में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हूं।

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हमारी प्रबंधकारिणी समिति का आग्रह है कि आप हमारे वार्षिक सम्मेलन का अध्यक्ष बनना स्वीकार करें। हम आपकी सुविधानुसार इस सम्मेलन की तारीखों में परिवर्तन कर सकते हैं। पंजाब के स्वतंत्र विचारों वाले हरिजनों की आपसे मिलने और अपनी योजनाओं पर आपसे विचार - विमर्श करने की बड़ी इच्छा है। अतः यदि आप लाहौर आकर सम्मेलन की अध्यक्षता करने की कृपा करें तो दो काम हो जाएंगे।

हम सभी विचारधाराओं के हरिजन नेताओं को आमंत्रित करेंगे और इससे आपको उन्हें अपने विचारों से अवगत कराने का अवसर मिल सकेगा।

मंडल ने अपने सहायक मंत्री श्री इन्द्र सिंह को क्रिसमस के अवसर पर बंबई में आपसे मिलने और सारी स्थिति पर आपसे चर्चा करने के लिए नियुक्त किया है, जिससे आपको हमारे अनुरोध को स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सके।

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