44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इसके साथ थी तथा उनकी संख्या और भी बड़ी थी। जो लोग सामाजिक सम्मेलन में उपस्थित हुए, उनकी संख्या बहत कम थी। इस उदासीनता और कार्यकर्ताओं में हुई कमी के शीघ्र बाद राजनीतिज्ञों की ओर से इसका सक्रिय विरोध आरंभ हो गया। कांग्रेस ने शिष्टता के नाते सामाजिक सम्मेलन को अपने पंडाल का प्रयोग करने की जो अनुमति दे रखी थी, स्वर्गीय श्री तिलक के नेतृत्व में उसे वापस ले लिया गया और शत्रुता की भावना इतनी गहरी हो गई कि जब सामाजिक सम्मेलन ने अपना पंडाल खड़ा करने की इच्छा की तो इसके विरोधियों ने पंडाल को जला डालने की धमकी दी। इस प्रकार समय के साथ - साथ राजनीतिक सुधार के पक्ष वाले दल की जीत हुई और सामाजिक सम्मेलन गायब हो गया और लोग उसे भूल गए। इलाहाबाद में हुए कांग्रेस के आठवें अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में श्री डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने जो भाषण दिया था, वह सामाजिक सम्मेलन की मृत्यु पर पढ़े गए शोक संदेश जैसा लगता है। वह कांग्रेस की प्रवृत्ति का इतना द्योतक है कि मैं उससे यहां एक उद्धरण दे रहा हूं। श्री बनर्जी ने कहा था :
मैं ऐसे लोगों की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं हूं, जो यह कहते हैं कि हम अपनी सामाजिक प्रणाली में सुधार नहीं करेंगे, जब तक हम राजनीतिक सुधारों के योग्य नहीं हो सकेंगे। मुझे दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दिखाई देता।............क्या हम (राजनीतिक सधार के लिए) इसलिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि हमारी विधवाएं अविवाहित रह जाती हैं और हमारी लड़कियां अन्य देशों की तुलना में बहुत पहले ही विवाह - सूत्र में बांध दी जाती हैं। क्योंकि पत्नी और पुत्रियां हमारे मित्रों से मिलने जाने के लिए हमारे साथ कारों में नहीं चलतीं? क्योंकि हम अपनी पुत्रियों को ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज नहीं भेजते?
मैंने जैसा कि श्री बनर्जी ने प्रस्तुत किया था, राजनीतिक सुधार का मामला आपके सामने रखा है। अनेक लोग ऐसे थे, जो यह जानकार प्रसन्न थे कि कांग्रेस की जीत हुई। किन्तु जो लोग समाज सुधार के महत्व में विश्वास रखते हैं वे पूछ सकते हैं कि क्या श्री बनर्जी की दलील अंतिम है? क्या इससे यह सिद्ध होता है कि जीत उन्हीं की हुई, जो न्याय - संगत थे? क्या निष्कर्ष रूप में इससे यह सिद्ध होता है कि समाज सुधार का राजनीतिक सुधार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? यदि मैं मामले के दूसरे पहलू पर विचार करूं तो इससे मामले को समझने में सहायता मिलेगी। मैं अपने तथ्यों के लिए अछूतों के साथ व्यवहार का उल्लेख करूंगा।
मराठा राज्य में पेशवाओं के शासन में यदि कोई हिन्दू सड़क पर आ रहा होता था तो किसी अछूत को इसलिए उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी कि उसकी परछाई से वह हिन्दू अपवित्र हो जाएगा। अछूत के लिए यह आवश्यक था कि वह अपनी कलाई या गर्दन में निशानी के तौर पर एक काला धागा बांधे, जिससे कि हिन्दू गलती से उससे छूकर अपवित्र हो जाने से बच जाए। पेशवाओं की राजधानी पूना में किसी भी अछूत के लिए अपनी कमर में झाडू बांधकर चलना आवश्यक था, जिससे कि उसके चलने से पीछे