जातिप्रथा - उन्मूलन
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की धूल साफ होती रहे और ऐसा न हो कि कहीं उस रास्ते से चलने वाला कोई हिन्दू उससे अपवित्र हो जाए। पूना में अछूतों के लिए यह आवश्यक था कि जहां कहीं भी वे जाएं, अपने थूकने के लिए मिट्टी का एक बर्तन अपनी गर्दन में लटका कर चलें, क्योंकि ऐसा न हो कि कहीं जमीन पर पड़ने वाले उसके थूक से अनजाने में वहां से गुजरने वाला कोई हिन्दू अपवित्र हो जाए। मैं हाल ही के कुछ और तथ्यों का भी यहां उल्लेख करना चाहता हूं। मध्य भारत की बलाई नाम की एक अछूत जाति पर हिन्दुओं द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का जिक्र करना काफी होगा। चार जनवरी, 1928 के ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ की एक रिपोर्ट आप देखें। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ के संवाददाता ने समाचार दिया है कि कनरिया, बिचोली - हाफसी, बिचोली - मर्दाना गांवों तथा इंदौर जिले (इंदौर रियासत के) के 15 अन्य गांवों की ऊंची जाति के हिन्दुओं ने, अर्थात् कालोटो, राजपूतों और ब्राह्मणों, जिनमें पटेल और पटवारी भी शामिल हैं, अपने - अपने गांवों के बलाइयों को सूचित किया है कि यदि वे उनमें रहना चाहते हैं तो उन्हें नियमों का अवश्य पालन करना होगा :
(क) बलाई, सुनहरी गोटेदार किनारी की पगडि़यां नहीं बांधेंगे।
(ख) वे रंगीन या फैंसी किनारी की धोतियां नहीं पहनेंगे।
(ग) वे किसी हिन्दू की मृत्यु पर मृतक के संबंधियों को चाहे वे कितनी भी दूर क्यों
न रहते हों, मरने की सूचना देंगे।
(घ) सभी हिन्दुओं के विवाहों में बलाई लोग बारात के आगे और विवाह के दौरान
बाजा बजाएंगे।
(ड.) बलाई स्त्रियों सोने या चांदी के आभूषण नहीं पहनेंगी। वे फैंसी गाउन या
जाकेट भी नहीं पहनेंगी।
(च) बलाई स्त्रियों को हिन्दू स्त्रियों के प्रसव के सभी मामलों मेंं देखभाल करनी
होगी।
(छ) बलाई लोगों के बिना कोई पारिश्रमिक मांगे सेवा करनी होगी और हिन्दू उन्हें
जो कुछ खुश होकर देंगे, लेना होगा।
(ज) अगर बलाई लोग इन शर्तों का पालन करना स्वीकार नहीं करते हैं तो उन्हें
गांव को छोड़ना होगा।
बलाई लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया और हिन्दुओं ने उनके विरुद्ध कार्रवाई की। बलाइयों को गांवों के कुओं से पानी नहीं भरने दिया गया। उन्हें अपने पशुओं को चराने के लिए नहीं ले जाने दिया गया। बलाई लोगों को हिन्दुओं की भूमि से गुजरने की मनाही कर दी, ताकि यदि किसी बलाई का खेत हिन्दुओं के खेतों से घिरा हो तो बलाई अपने ही खेत तक न पहुंच सकें। हिन्दुओं ने अपने पशुओं को भी बलाइयों के खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया। बलाइयों ने इन अत्याचारों के विरुद्ध दरबार में याचिकाएं दायर कीं, किन्तु चूंकि उन्हें समय पर कोई राहत नहीं मिली और अत्याचार जारी रहा तो सैकड़ों बलाई लोग अपने बाल - बच्चों सहित अपने घरों को जहां वे पीढि़यों से रहते