2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 63

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

आ रहे थे, छोड़कर समीपवर्ती रियासतों, अर्थात् धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्वालियर तथा अन्य रियासतों के गांवों में जाकर बसने के लिए मजबूर हो गए। अपने नए घरों में उनकी क्या स्थिति रही, उस पर फिलहाल हम विचार नहीं करेंगे। गुजरात में कविठा की घटना तो पिछले ही वर्ष घटी है। कविठा के हिन्दुओं ने अछूतों को आदेश दिया कि वे अपने बच्चों को सरकार द्वारा चलाए जा रहे गांव के आम स्कूल में न भेजें। हिन्दुओं की इच्छाओं के विरुद्ध नागरिक अधिकार का प्रयोग करने का साहस करने के लिए कविठा के अछूतों को कितने कष्टों का सामना करना पड़ा सभी जानते हैं, इसे विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है। एक अन्य घटना गुजरात में अहमदाबाद जिले के जानू गांव में हुई। नवम्बर 1935 में सम्पन्न परिवारों की कुछ अछूत महिलाओं ने धातु के बर्तनों में पानी लाना आरंभ कर दिया। हिन्दुओं ने अछूतों द्वारा धातु के बर्तनों के प्रयोग को अपने सम्मान के विरुद्ध समझा और अछूत महिलाओं पर इस गुस्ताखी के लिए हमला किया। एक बहुत ही नई घटना की सूचना जयपुर रियासत में चकवारा से मिली है। समाचार - पत्रों में छपी सूचना से पता चलता है कि चकवारा के एक अछूत ने जो तीर्थ - यात्रा के बाद घर लौटा था, अपने धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने के लिए गांव के अपने अछूत भाइयों को भोज देने की व्यवसायी की थी। मेजबान की इच्छा थी कि मेहमानों को बहुमूल्य भोजन खिलाया जाए और उसमें घी से युक्त व्यंजन भी परोसे जाएं। किन्तु जिस समय अछूत लोग भोजन कर रहे थे तो सैकड़ों की संख्या में हिन्दू लाठियां लेकर वहां दौड़े और भोजन को खराब कर दिया तथा अछूतों को बुरी तरह पीटा। परोसे गए भोजन को छोड़, मेहमान अपनी जान बचाने के लिए भाग गए। निःसहाय अछूतों पर ऐसा प्राणघातक आक्रमण क्यों किया गया? इसका जो कारण बताया गया है, वह यह था कि अछूत मेजबान इतना धृष्ट था कि उसने घी का प्रयोग किया और उसके अछूत मेहमान इतने मुर्ख थे कि वे उसे खो रहे थे। घी निःसंदेह अमीरों के लिए एक विलास की वस्तु है। किन्तु कोई भी यह नहीं सोचेगा कि घी ऊंचे सामाजिक स्तर का प्रतीक है। चकवारा के हिन्दुओं ने इसका दूसरा अर्थ लिया और उन अछूतों द्वारा उनके साथ की गई गलती के लिए हिन्दुओं के धार्मिक क्रोध में उनसे बदला लिया, जिन्होंने अपने भोजन में घी परोसकर उनका अपमान किया था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि वे हिन्दुओं के सम्मान की बराबरी नहीं कर सकते। इसका यह अर्थ है कि किसी अछूत को घी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना हिन्दुओं के प्रति उद्दंडता है। यह घटना पहली अप्रैल, 1936 या उसके आसपास की है।

इन तथ्यों को बताने के बाद अब मैं सामाजिक सुधार के बारे में बात करूंगा। ऐसा करने में मैं जहां तक हो सकता है, श्री बैनजी का अनुसरण करूंगा। मैं राजनीतिक प्रवृत्ति के हिन्दुओं से पूछता हूं, ‘‘जब आप अपने ही देश के अछूतों जैसे एक बहुत बड़े वर्ग को सार्वजनिक स्कूल का प्रयोग नहीं करने देते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें सार्वजनिक कुओं का प्रयोग नहीं करने दते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें आम सड़कों का प्रयोग नहीं करने देते तो क्या आप