2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 65

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मित्र और सहकर्मी था। 1862 में प्रशिया की एक सभा में लेजले ने कहा था :

‘‘संवैधानिक प्रश्न सर्वप्रथम अधिकार के प्रश्न नहीं, बल्कि शक्ति के प्रश्न होते हैं। किसी देश के वास्तविक संविधान का अस्तित्व उस देश में विद्यमान शक्ति की वास्तविक स्थिति में ही होता है। अतः राजनीतिक संविधानों का मूल्य और स्थायित्व केवल तभी होता है, जब कि वे शक्ति की उन शर्तों को सही - सही ढंग से प्रकट करते हैं जो किसी समाज में विद्यमान होती हैं।‘‘

किन्तु प्रशिया जाने की जरूरत नहीं है। घर में ही उसके प्रमाण हैं। उस सांप्रदायिक अधिनिर्णय का क्या महत्व है, जिसमें विविध जातियों और समुदायों के परिभाषित अनुपातों में राजनीतिक सत्ता का आवंटन हो? मेरे विचार से इसका महत्व इस बात में है कि राजनीतिक संवधिन को सामाजिक संगठन को ध्यान में रखना चाहिए। इससे प्रकट होता है कि ऐसे राजनीतिज्ञ जिन्होंने यह नहीं माना कि भारत की सामाजिक समस्या का राजनीतिक समस्या पर भी कोई प्रभाव है, वे संविधान तैयार करने में सामाजिक समस्या को मनाने के लिए बाध्य हुए। कहने का तात्पर्य यह है कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय सामाजिक सुधार की उपेक्षा से उत्पन्न प्रतिशोध है। यह सामाजिक सुधार दल के लिए विजय है जो यह दिखाता है कि चाहे वे हार गए, किन्तु उनका सामाजिक सुधार के महत्व पर बल देना ठीक था। मैं जानता हूं कि बहुत से लोग इस तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे। इस प्रकार का विचार अभी मौजूद है और इस बात पर विश्वास करना अच्छा लगता है कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय अस्वाभाविक है और यह नौकरशाही तथा अल्पसंख्यकों के बीच अपवित्र गठबंधन का परिणाम है। अगर यह कहा जाए कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय एक अच्छा साक्ष्य नहीं है तो मैं अपने मत के समर्थन में इस पर एक साक्ष्य के रूप में भरोसा नहीं करना चाहता। आयरलैंड को लीजिए। आयरिश होम रूल का इतिहास क्या बताता है? सब जानते हैं कि अल्स्टर और दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के दौरान दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि श्री रेडमंड ने अल्स्टर को समस्त, आयरलैंड के लिए समान होम रूल संविधान के अंतर्गत लाने के लिए अल्स्टर के प्रतिनिधियों से कहा था, ‘‘आप जिस राजनीतिक सुरक्षा को पसंद करते हैं, उसकी मांग करें, आपको वह मिलेगी।‘‘ पता है, अल्स्टर के लोगों ने क्या जबाव दिया? उनका उत्तर था, ‘‘धिक्कार है, आपकी सुरक्षा को हम किसी भी शर्त पर अपने ऊपर आपका शासन नहीं चाहते।‘‘ जो लोग भारत में अल्पसंख्यकों पर दोषारोपण करते हैं, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि यदि अल्पसंख्यक वह रवैया अपना लेते, जो अल्स्टर ने अपनाया था तो बहुसंख्यकों की राजनीतिक आकांक्षाओं का क्या होता? आयरिश होम रूल के प्रति अल्स्टर के रवैए को देखते हुए क्या यह कुछ भी नहीं है कि अल्पसंख्यक उस बहुसंख्यक के शासन में रहने को सहमत हो गए, जिसने राजनीतिज्ञता की कोई अधिक भावना नहीं दिखाई और क्यों उनके लिए कुछ सुरक्षात्मक उपायों की व्यवस्था की? किन्तु यह केवल आकस्मिक है। मुख्य प्रश्न यह है कि अल्स्टर ने ऐसा रवैया क्यों अपनाया? मैं इसका केवल एक